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भीष्म पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
निमीलिताक्षं तं वीरं साश्रुकण्ठस्तदा वृषः |  ४   क
अभ्येत्य पादय़ोस्तस्य निपपात महाद्युतिः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति