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शान्ति पर्व
अध्याय २१८
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शक्र उवाच
व्रह्मणास्मि समादिष्टो न हन्तव्यो भवानिति |  ३३   क
तेन तेऽहं वले वज्रं न विमुञ्चामि मूर्धनि ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति