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अनुशासन पर्व
अध्याय ९८
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जमदग्निरु उवाच
स्थिरं वापि चलं वापि जाने त्वां ज्ञानचक्षुषा |  ५   क
अवश्यं विनय़ाधानं कार्यमद्य मय़ा तव ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति