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वन पर्व
अध्याय ९८
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लोमश उवाच
चकार वज्रं भृशमुग्ररूपं; कृत्वा च शक्रं स उवाच हृष्टः |  २३   क
अनेन वज्रप्रवरेण देव; भस्मीकुरुष्वाद्य सुरारिमुग्रम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति