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वन पर्व
अध्याय ९८
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लोमश उवाच
ततो हतारिः सगणः सुखं वै; प्रशाधि कृत्स्नं त्रिदिवं दिविष्ठः |  २४   क
त्वष्ट्रा तथोक्तः स पुरन्दरस्तु; वज्रं प्रहृष्टः प्रय़तोऽभ्यगृह्णात् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति