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भीष्म पर्व
अध्याय ९८
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सञ्जय़ उवाच
गजमध्यमनुप्राप्तः पाण्डवश्च व्यराजत |  ३१   क
मेघजालस्य महतो यथा मध्यगतो रविः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति