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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत धर्मज्ञ रुद्रकोटिं समाहितः |  १२४   क
पुरा यत्र महाराज ऋषिकोटिः समाहिता |  १२४   ख
प्रहर्षेण च संविष्टा देवदर्शनकाङ्क्षय़ा ||  १२४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति