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द्रोण पर्व
अध्याय ९८
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सञ्जय़ उवाच
दुःशासनरथं दृष्ट्वा समीपे पर्यवस्थितम् |  १   क
भारद्वाजस्ततो वाक्यं दुःशासनमथाव्रवीत् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति