द्रोण पर्व  अध्याय ९८

सञ्जय़ उवाच

यावद्भीमो महावाहुर्विगाह्य महतीं चमूम् |  १८   क
सोदरांस्ते न मृद्नाति तावत्संशाम्य पाण्डवैः ||  १८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति