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द्रोण पर्व
अध्याय ९८
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सञ्जय़ उवाच
द्रोणोऽपि रथिनां श्रेष्ठः पाञ्चालान्पाण्डवांस्तथा |  २४   क
अभ्यद्रवत सङ्क्रुद्धो जवमास्थाय़ मध्यमम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति