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शल्य पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
ततो धनञ्जय़ः क्रुद्धः कृपं सह पदानुगैः |  ४   क
अवाकिरच्छरौघेण कृतवर्माणमेव च ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति