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द्रोण पर्व
अध्याय ९८
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सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतं महाराज दृष्टवानस्मि संय़ुगे |  २९   क
यद्द्रोणो रभसं युद्धे पाञ्चाल्यं नाभ्यवर्तत ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति