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द्रोण पर्व
अध्याय ९८
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सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालान्निहतान्दृष्ट्वा देवकल्पान्महारथान् |  ४३   क
धृष्टद्युम्नो भृशं क्रुद्धो नेत्राभ्यां पातय़ञ्जलम् |  ४३   ख
अभ्यवर्तत सङ्ग्रामे क्रुद्धो द्रोणरथं प्रति ||  ४३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति