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शल्य पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
वीरुदोषधय़श्चैव वीजानि विविधानि च |  ६५   क
तथा वय़ं लोकगुरो प्रसादं कर्तुमर्हसि ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति