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द्रोण पर्व
अध्याय ९८
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सञ्जय़ उवाच
आरुह्य स्वरथं वीरः प्रगृह्य च महद्धनुः |  ५३   क
विव्याध समरे द्रोणं धृष्टद्युम्नो महारथः ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति