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उद्योग पर्व
अध्याय १२२
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वैशम्पाय़न उवाच
तथा विराटनगरे श्रूय़ते महदद्भुतम् |  ५३   क
एकस्य च वहूनां च पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति