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शान्ति पर्व
अध्याय ९९
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इन्द्र उवाच
भर्तुरर्थे तु यः शूरो विक्रमेद्वाहिनीमुखे |  २७   क
भय़ान्न च निवर्तेत तस्य लोका यथा मम ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति