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द्रोण पर्व
अध्याय २१
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सञ्जय़ उवाच
भ्रमरैरिव चाविष्टा द्रोणस्य निशितैः शरैः |  १५   क
अन्योन्यं समलीय़न्त पलाय़नपराय़णाः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति