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शान्ति पर्व
अध्याय ९९
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इन्द्र उवाच
यस्य शोणितवेगेन नदी स्यात्समभिप्लुता |  ४०   क
केशमांसास्थिसङ्कीर्णा स गच्छेत्परमां गतिम् ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति