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शान्ति पर्व
अध्याय ९९
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इन्द्र उवाच
वृद्धं वलं न हन्तव्यं नैव स्त्री न च वै द्विजः |  ४७   क
तृणपूर्णमुखश्चैव तवास्मीति च यो वदेत् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति