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शान्ति पर्व
अध्याय ९९
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इन्द्र उवाच
अहं वृत्रं वलं पाकं शतमाय़ं विरोचनम् |  ४८   क
दुरावार्यं च नमुचिं नैकमाय़ं च शम्वरम् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति