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शान्ति पर्व
अध्याय १८५
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भृगुरु उवाच
उत्तरे हिमवत्पार्श्वे पुण्ये सर्वगुणान्विते |  ८   क
पुण्यः क्षेम्यश्च काम्यश्च स वरो लोक उच्यते ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति