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वन पर्व
अध्याय ९९
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लोमश उवाच
ततो महेन्द्रः परमाभितप्तः; श्रुत्वा रवं घोररूपं महान्तम् |  १३   क
भय़े निमग्नस्त्वरितं मुमोच; वज्रं महत्तस्य वधाय़ राजन् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति