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वन पर्व
अध्याय ९९
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लोमश उवाच
स शक्रवज्राभिहतः पपात; महासुरः काञ्चनमाल्यधारी |  १४   क
यथा महाञ्शैलवरः पुरस्ता; त्स मन्दरो विष्णुकरात्प्रमुक्तः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति