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वन पर्व
अध्याय ९९
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लोमश उवाच
एवं हि सर्वे गतवुद्धिभावा; जगद्विनाशे परमप्रहृष्टाः |  २१   क
दुर्गं समाश्रित्य महोर्मिमन्तं; रत्नाकरं वरुणस्यालय़ं स्म ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति