वन पर्व  अध्याय ९९

लोमश उवाच

शिरोभिः प्रपतद्भिश्च अन्तरिक्षान्महीतलम् |  ५   क
तालैरिव महीपाल वृन्ताद्भ्रष्टैरदृश्यत ||  ५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति