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भीष्म पर्व
अध्याय ९९
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सञ्जय़ उवाच
अनय़न्परलोकाय़ शरैः संनतपर्वभिः |  १८   क
अस्त्रैश्च विविधैर्घोरैस्तत्र तत्र विशां पते ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति