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द्रोण पर्व
अध्याय ९९
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सञ्जय़ उवाच
स तु तं प्रतिविव्याध पञ्चभिर्निशितैः शरैः |  १५   क
रुक्मपुङ्खैर्महेष्वासो गार्ध्रपत्रैरजिह्मगैः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति