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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
ततो दिग्भ्यः समापेतुः सिंहव्याघ्रतरक्षवः |  १००   क
अग्निजिह्वाश्च भुजगा विहगाश्चाप्ययोमुखाः ||  १००   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति