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द्रोण पर्व
अध्याय ९९
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सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्तु विंशत्या सात्यकिं प्रत्यविध्यत |  २२   क
सात्वतोऽपि महाराज तं विव्याध स्तनान्तरे |  २२   ख
त्रिभिरेव महावेगैः शरैः संनतपर्वभिः ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति