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द्रोण पर्व
अध्याय १२९
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सञ्जय़ उवाच
ततः समभवद्युद्धं सन्ध्याय़ामतिदारुणम् |  १८   क
द्रोणस्य च महाराज सृञ्जय़ानां च सर्वशः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति