वन पर्व  अध्याय २६४

मार्कण्डेय़ उवाच

इति सा मृगशावाक्षी तच्छ्रुत्वा त्रिजटावचः |  ७२   क
वभूवाशावती वाला पुनर्भर्तृसमागमे ||  ७२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति