सूत उवाच:
इष्टं हि विदुषां लोके समासव्यासधारणम् ||
४९ ख
सूत उवाच:
मन्वादि भारतं केचिदास्तीकादि तथापरे |
५० क
सूत उवाच:
तथोपरिचराद्यन्ये विप्राः सम्यगधीय़ते ||
५० ख
सूत उवाच:
विविधं संहिताज्ञानं दीपय़न्ति मनीषिणः |
५१ क
सूत उवाच:
व्याख्यातुं कुशलाः केचिद्ग्रन्थं धारय़ितुं परे ||
५१ ख
सूत उवाच:
तपसा व्रह्मचर्येण व्यस्य वेदं सनातनम् |
५२ क
सूत उवाच:
इतिहासमिमं चक्रे पुण्यं सत्यवतीसुतः ||
५२ ख
सूत उवाच:
पराशरात्मजो विद्वान्व्रह्मर्षिः संशितव्रतः |
५३ क
सूत उवाच:
मातुर्निय़ोगाद्धर्मात्मा गाङ्गेय़स्य च धीमतः ||
५३ ख
सूत उवाच:
क्षेत्रे विचित्रवीर्यस्य कृष्णद्वैपाय़नः पुरा |
५४ क
सूत उवाच:
त्रीनग्नीनिव कौरव्याञ्जनय़ामास वीर्यवान् ||
५४ ख
सूत उवाच:
उत्पाद्य धृतराष्ट्रं च पाण्डुं विदुरमेव च |
५५ क
सूत उवाच:
जगाम तपसे धीमान्पुनरेवाश्रमं प्रति ||
५५ ख
सूत उवाच:
तेषु जातेषु वृद्धेषु गतेषु परमां गतिम् |
५६ क
सूत उवाच:
अव्रवीद्भारतं लोके मानुषेऽस्मिन्महानृषिः ||
५६ ख
सूत उवाच:
जनमेजय़ेन पृष्टः सन्व्राह्मणैश्च सहस्रशः |
५७ क
सूत उवाच:
शशास शिष्यमासीनं वैशम्पाय़नमन्तिके ||
५७ ख
सूत उवाच:
स सदस्यैः सहासीनः श्रावय़ामास भारतम् |
५८ क
सूत उवाच:
कर्मान्तरेषु यज्ञस्य चोद्यमानः पुनः पुनः ||
५८ ख
सूत उवाच:
विस्तरं कुरुवंशस्य गान्धार्या धर्मशीलताम् |
५९ क
सूत उवाच:
क्षत्तुः प्रज्ञां धृतिं कुन्त्याः सम्यग्द्वैपाय़नोऽव्रवीत् ||
५९ ख
सूत उवाच:
वासुदेवस्य माहात्म्यं पाण्डवानां च सत्यताम् |
६० क
सूत उवाच:
दुर्वृत्तं धार्तराष्ट्राणामुक्तवान्भगवानृषिः ||
६० ख
सूत उवाच:
चतुर्विंशतिसाहस्रीं चक्रे भारतसंहिताम् |
६१ क
सूत उवाच:
उपाख्यानैर्विना तावद्भारतं प्रोच्यते वुधैः ||
६१ ख
सूत उवाच:
ततोऽध्यर्धशतं भूय़ः सङ्क्षेपं कृतवानृषिः |
६२ क
सूत उवाच:
अनुक्रमणिमध्याय़ं वृत्तान्तानां सपर्वणाम् ||
६२ ख
सूत उवाच:
इदं द्वैपाय़नः पूर्वं पुत्रमध्यापय़च्छुकम् |
६३ क
सूत उवाच:
ततोऽन्येभ्योऽनुरूपेभ्यः शिष्येभ्यः प्रददौ प्रभुः ||
६३ ख
सूत उवाच:
नारदोऽश्रावय़द्देवानसितो देवलः पितृन् |
६४ क
सूत उवाच:
गन्धर्वय़क्षरक्षांसि श्रावय़ामास वै शुकः ||
६४ ख
सूत उवाच:
दुर्योधनो मन्युमय़ो महाद्रुमः; स्कन्धः कर्णः शकुनिस्तस्य शाखाः |
६५ क
सूत उवाच:
दुःशासनः पुष्पफले समृद्धे; मूलं राजा धृतराष्ट्रोऽमनीषी ||
६५ ख
सूत उवाच:
युधिष्ठिरो धर्ममय़ो महाद्रुमः; स्कन्धोऽर्जुनो भीमसेनोऽस्य शाखाः |
६६ क
सूत उवाच:
माद्रीसुतौ पुष्पफले समृद्धे; मूलं कृष्णो व्रह्म च व्राह्मणाश्च ||
६६ ख
सूत उवाच:
पाण्डुर्जित्वा वहून्देशान्युधा विक्रमणेन च |
६७ क
सूत उवाच:
अरण्ये मृगय़ाशीलो न्यवसत्सजनस्तदा ||
६७ ख
सूत उवाच:
मृगव्यवाय़निधने कृच्छ्रां प्राप स आपदम् |
६८ क
सूत उवाच:
जन्मप्रभृति पार्थानां तत्राचारविधिक्रमः ||
६८ ख
सूत उवाच:
मात्रोरभ्युपपत्तिश्च धर्मोपनिषदं प्रति |
६९ क
सूत उवाच:
धर्मस्य वाय़ोः शक्रस्य देवय़ोश्च तथाश्विनोः ||
६९ ख
सूत उवाच:
तापसैः सह संवृद्धा मातृभ्यां परिरक्षिताः |
७० क
सूत उवाच:
मेध्यारण्येषु पुण्येषु महतामाश्रमेषु च ||
७० ख
सूत उवाच:
ऋषिभिश्च तदानीता धार्तराष्ट्रान्प्रति स्वय़म् |
७१ क
सूत उवाच:
शिशवश्चाभिरूपाश्च जटिला व्रह्मचारिणः ||
७१ ख
सूत उवाच:
पुत्राश्च भ्रातरश्चेमे शिष्याश्च सुहृदश्च वः |
७२ क
सूत उवाच:
पाण्डवा एत इत्युक्त्वा मुनय़ोऽन्तर्हितास्ततः ||
७२ ख
सूत उवाच:
तांस्तैर्निवेदितान्दृष्ट्वा पाण्डवान्कौरवास्तदा |
७३ क
सूत उवाच:
शिष्टाश्च वर्णाः पौरा ये ते हर्षाच्चुक्रुशुर्भृशम् ||
७३ ख
सूत उवाच:
आहुः केचिन्न तस्यैते तस्यैत इति चापरे |
७४ क
सूत उवाच:
यदा चिरमृतः पाण्डुः कथं तस्येति चापरे ||
७४ ख
सूत उवाच:
स्वागतं सर्वथा दिष्ट्या पाण्डोः पश्याम सन्ततिम् |
७५ क
सूत उवाच:
उच्यतां स्वागतमिति वाचोऽश्रूय़न्त सर्वशः ||
७५ ख
सूत उवाच:
तस्मिन्नुपरते शव्दे दिशः सर्वा विनादय़न् |
७६ क
सूत उवाच:
अन्तर्हितानां भूतानां निस्वनस्तुमुलोऽभवत् ||
७६ ख
सूत उवाच:
पुष्पवृष्टिः शुभा गन्धाः शङ्खदुन्दुभिनिस्वनाः |
७७ क
सूत उवाच:
आसन्प्रवेशे पार्थानां तदद्भुतमिवाभवत् ||
७७ ख
सूत उवाच:
तत्प्रीत्या चैव सर्वेषां पौराणां हर्षसम्भवः |
७८ क
सूत उवाच:
शव्द आसीन्महांस्तत्र दिवस्पृक्कीर्तिवर्धनः ||
७८ ख
सूत उवाच:
तेऽप्यधीत्याखिलान्वेदाञ्शास्त्राणि विविधानि च |
७९ क
सूत उवाच:
न्यवसन्पाण्डवास्तत्र पूजिता अकुतोभय़ाः ||
७९ ख
सूत उवाच:
युधिष्ठिरस्य शौचेन प्रीताः प्रकृतय़ोऽभवन् |
८० क
सूत उवाच:
धृत्या च भीमसेनस्य विक्रमेणार्जुनस्य च ||
८० ख
सूत उवाच:
गुरुशुश्रूषय़ा कुन्त्या यमय़ोर्विनय़ेन च |
८१ क
सूत उवाच:
तुतोष लोकः सकलस्तेषां शौर्यगुणेन च ||
८१ ख
सूत उवाच:
समवाय़े ततो राज्ञां कन्यां भर्तृस्वय़ंवराम् |
८२ क
सूत उवाच:
प्राप्तवानर्जुनः कृष्णां कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ||
८२ ख
सूत उवाच:
ततः प्रभृति लोकेऽस्मिन्पूज्यः सर्वधनुष्मताम् |
८३ क
सूत उवाच:
आदित्य इव दुष्प्रेक्ष्यः समरेष्वपि चाभवत् ||
८३ ख
सूत उवाच:
स सर्वान्पार्थिवाञ्जित्वा सर्वांश्च महतो गणान् |
८४ क
सूत उवाच:
आजहारार्जुनो राज्ञे राजसूय़ं महाक्रतुम् ||
८४ ख
सूत उवाच:
अन्नवान्दक्षिणावांश्च सर्वैः समुदितो गुणैः |
८५ क
सूत उवाच:
युधिष्ठिरेण सम्प्राप्तो राजसूय़ो महाक्रतुः ||
८५ ख
सूत उवाच:
सुनय़ाद्वासुदेवस्य भीमार्जुनवलेन च |
८६ क
सूत उवाच:
घातय़ित्वा जरासन्धं चैद्यं च वलगर्वितम् ||
८६ ख
सूत उवाच:
दुर्योधनमुपागच्छन्नर्हणानि ततस्ततः |
८७ क
सूत उवाच:
मणिकाञ्चनरत्नानि गोहस्त्यश्वधनानि च ||
८७ ख
सूत उवाच:
समृद्धां तां तथा दृष्ट्वा पाण्डवानां तदा श्रिय़म् |
८८ क
सूत उवाच:
ईर्ष्यासमुत्थः सुमहांस्तस्य मन्युरजाय़त ||
८८ ख
सूत उवाच:
विमानप्रतिमां चापि मय़ेन सुकृतां सभाम् |
८९ क
सूत उवाच:
पाण्डवानामुपहृतां स दृष्ट्वा पर्यतप्यत ||
८९ ख
सूत उवाच:
यत्रावहसितश्चासीत्प्रस्कन्दन्निव सम्भ्रमात् |
९० क
सूत उवाच:
प्रत्यक्षं वासुदेवस्य भीमेनानभिजातवत् ||
९० ख
सूत उवाच:
स भोगान्विविधान्भुञ्जन्रत्नानि विविधानि च |
९१ क
सूत उवाच:
कथितो धृतराष्ट्रस्य विवर्णो हरिणः कृशः ||
९१ ख
सूत उवाच:
अन्वजानात्ततो द्यूतं धृतराष्ट्रः सुतप्रिय़ः |
९२ क
सूत उवाच:
तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य कोपः समभवन्महान् ||
९२ ख
सूत उवाच:
नातिप्रीतमनाश्चासीद्विवादांश्चान्वमोदत |
९३ क
सूत उवाच:
द्यूतादीननय़ान्घोरान्प्रवृद्धांश्चाप्युपैक्षत ||
९३ ख
सूत उवाच:
निरस्य विदुरं द्रोणं भीष्मं शारद्वतं कृपम् |
९४ क
सूत उवाच:
विग्रहे तुमुले तस्मिन्नहन्क्षत्रं परस्परम् ||
९४ ख
सूत उवाच:
जय़त्सु पाण्डुपुत्रेषु श्रुत्वा सुमहदप्रिय़म् |
९५ क
सूत उवाच:
दुर्योधनमतं ज्ञात्वा कर्णस्य शकुनेस्तथा |
९५ ख
सूत उवाच:
धृतराष्ट्रश्चिरं ध्यात्वा सञ्जय़ं वाक्यमव्रवीत् ||
९५ ग
सूत उवाच:
शृणु सञ्जय़ मे सर्वं न मेऽसूय़ितुमर्हसि |
९६ क
सूत उवाच:
श्रुतवानसि मेधावी वुद्धिमान्प्राज्ञसंमतः ||
९६ ख
सूत उवाच:
न विग्रहे मम मतिर्न च प्रीय़े कुरुक्षय़े |
९७ क
सूत उवाच:
न मे विशेषः पुत्रेषु स्वेषु पाण्डुसुतेषु च ||
९७ ख
सूत उवाच:
वृद्धं मामभ्यसूय़न्ति पुत्रा मन्युपराय़णाः |
९८ क
सूत उवाच:
अहं त्वचक्षुः कार्पण्यात्पुत्रप्रीत्या सहामि तत् |
९८ ख