सूत उवाच:
मुह्यन्तं चानुमुह्यामि दुर्योधनमचेतनम् ||
९८ ग
सूत उवाच:
राजसूय़े श्रिय़ं दृष्ट्वा पाण्डवस्य महौजसः |
९९ क
सूत उवाच:
तच्चावहसनं प्राप्य सभारोहणदर्शने ||
९९ ख
सूत उवाच:
अमर्षितः स्वय़ं जेतुमशक्तः पाण्डवान्रणे |
१०० क
सूत उवाच:
निरुत्साहश्च सम्प्राप्तुं श्रिय़मक्षत्रिय़ो यथा |
१०० ख
सूत उवाच:
गान्धारराजसहितश्छद्मद्यूतममन्त्रय़त् ||
१०० ग
सूत उवाच:
तत्र यद्यद्यथा ज्ञातं मय़ा सञ्जय़ तच्छृणु |
१०१ क
सूत उवाच:
श्रुत्वा हि मम वाक्यानि वुद्ध्या युक्तानि तत्त्वतः |
१०१ ख
सूत उवाच:
ततो ज्ञास्यसि मां सौते प्रज्ञाचक्षुषमित्युत ||
१०१ ग
सूत उवाच:
यदाश्रौषं धनुराय़म्य चित्रं; विद्धं लक्ष्यं पातितं वै पृथिव्याम् |
१०२ क
सूत उवाच:
कृष्णां हृतां पश्यतां सर्वराज्ञां; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१०२ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं द्वारकाय़ां सुभद्रां; प्रसह्योढां माधवीमर्जुनेन |
१०३ क
सूत उवाच:
इन्द्रप्रस्थं वृष्णिवीरौ च यातौ; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१०३ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं देवराजं प्रवृष्टं; शरैर्दिव्यैर्वारितं चार्जुनेन |
१०४ क
सूत उवाच:
अग्निं तथा तर्पितं खाण्डवे च; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१०४ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं हृतराज्यं युधिष्ठिरं; पराजितं सौवलेनाक्षवत्याम् |
१०५ क
सूत उवाच:
अन्वागतं भ्रातृभिरप्रमेय़ै; स्तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१०५ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं द्रौपदीमश्रुकण्ठीं; सभां नीतां दुःखितामेकवस्त्राम् |
१०६ क
सूत उवाच:
रजस्वलां नाथवतीमनाथव; त्तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१०६ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं विविधास्तात चेष्टा; धर्मात्मनां प्रस्थितानां वनाय़ |
१०७ क
सूत उवाच:
ज्येष्ठप्रीत्या क्लिश्यतां पाण्डवानां; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१०७ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं स्नातकानां सहस्रै; रन्वागतं धर्मराजं वनस्थम् |
१०८ क
सूत उवाच:
भिक्षाभुजां व्राह्मणानां महात्मनां; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१०८ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषमर्जुनो देवदेवं; किरातरूपं त्र्यम्वकं तोष्य युद्धे |
१०९ क
सूत उवाच:
अवाप तत्पाशुपतं महास्त्रं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१०९ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं त्रिदिवस्थं धनञ्जय़ं; शक्रात्साक्षाद्दिव्यमस्त्रं यथावत् |
११० क
सूत उवाच:
अधीय़ानं शंसितं सत्यसन्धं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
११० ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं वैश्रवणेन सार्धं; समागतं भीममन्यांश्च पार्थान् |
१११ क
सूत उवाच:
तस्मिन्देशे मानुषाणामगम्ये; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१११ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं घोषय़ात्रागतानां; वन्धं गन्धर्वैर्मोक्षणं चार्जुनेन |
११२ क
सूत उवाच:
स्वेषां सुतानां कर्णवुद्धौ रतानां; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
११२ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं यक्षरूपेण धर्मं; समागतं धर्मराजेन सूत |
११३ क
सूत उवाच:
प्रश्नानुक्तान्विव्रुवन्तं च सम्य; क्तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
११३ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं मामकानां वरिष्ठा; न्धनञ्जय़ेनैकरथेन भग्नान् |
११४ क
सूत उवाच:
विराटराष्ट्रे वसता महात्मना; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
११४ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं सत्कृतां मत्स्यराज्ञा; सुतां दत्तामुत्तरामर्जुनाय़ |
११५ क
सूत उवाच:
तां चार्जुनः प्रत्यगृह्णात्सुतार्थे; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
११५ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं निर्जितस्याधनस्य; प्रव्राजितस्य स्वजनात्प्रच्युतस्य |
११६ क
सूत उवाच:
अक्षौहिणीः सप्त युधिष्ठिरस्य; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
११६ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं नरनाराय़णौ तौ; कृष्णार्जुनौ वदतो नारदस्य |
११७ क
सूत उवाच:
अहं द्रष्टा व्रह्मलोके सदेति; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
११७ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं माधवं वासुदेवं; सर्वात्मना पाण्डवार्थे निविष्टम् |
११८ क
सूत उवाच:
यस्येमां गां विक्रममेकमाहु; स्तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
११८ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं कर्णदुर्योधनाभ्यां; वुद्धिं कृतां निग्रहे केशवस्य |
११९ क
सूत उवाच:
तं चात्मानं वहुधा दर्शय़ानं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
११९ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं वासुदेवे प्रय़ाते; रथस्यैकामग्रतस्तिष्ठमानाम् |
१२० क
सूत उवाच:
आर्तां पृथां सान्त्वितां केशवेन; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१२० ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं मन्त्रिणं वासुदेवं; तथा भीष्मं शान्तनवं च तेषाम् |
१२१ क
सूत उवाच:
भारद्वाजं चाशिषोऽनुव्रुवाणं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१२१ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं कर्ण उवाच भीष्मं; नाहं योत्स्ये युध्यमाने त्वय़ीति |
१२२ क
सूत उवाच:
हित्वा सेनामपचक्राम चैव; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१२२ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं वासुदेवार्जुनौ तौ; तथा धनुर्गाण्डिवमप्रमेय़म् |
१२३ क
सूत उवाच:
त्रीण्युग्रवीर्याणि समागतानि; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१२३ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं कश्मलेनाभिपन्ने; रथोपस्थे सीदमानेऽर्जुने वै |
१२४ क
सूत उवाच:
कृष्णं लोकान्दर्शय़ानं शरीरे; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१२४ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं भीष्मममित्रकर्शनं; निघ्नन्तमाजावय़ुतं रथानाम् |
१२५ क
सूत उवाच:
नैषां कश्चिद्वध्यते दृश्यरूप; स्तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१२५ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं भीष्ममत्यन्तशूरं; हतं पार्थेनाहवेष्वप्रधृष्यम् |
१२६ क
सूत उवाच:
शिखण्डिनं पुरतः स्थापय़ित्वा; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१२६ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं शरतल्पे शय़ानं; वृद्धं वीरं सादितं चित्रपुङ्खैः |
१२७ क
सूत उवाच:
भीष्मं कृत्वा सोमकानल्पशेषां; स्तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१२७ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं शान्तनवे शय़ाने; पानीय़ार्थे चोदितेनार्जुनेन |
१२८ क
सूत उवाच:
भूमिं भित्त्वा तर्पितं तत्र भीष्मं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१२८ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं शुक्रसूर्यौ च युक्तौ; कौन्तेय़ानामनुलोमौ जय़ाय़ |
१२९ क
सूत उवाच:
नित्यं चास्माञ्श्वापदा व्याभषन्त; स्तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१२९ ख
सूत उवाच:
यदा द्रोणो विविधानस्त्रमार्गा; न्विदर्शय़न्समरे चित्रय़ोधी |
१३० क
सूत उवाच:
न पाण्डवाञ्श्रेष्ठतमान्निहन्ति; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१३० ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं चास्मदीय़ान्महारथा; न्व्यवस्थितानर्जुनस्यान्तकाय़ |
१३१ क
सूत उवाच:
संशप्तकान्निहतानर्जुनेन; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१३१ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं व्यूहमभेद्यमन्यै; र्भारद्वाजेनात्तशस्त्रेण गुप्तम् |
१३२ क
सूत उवाच:
भित्त्वा सौभद्रं वीरमेकं प्रविष्टं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१३२ ख
सूत उवाच:
यदाभिमन्युं परिवार्य वालं; सर्वे हत्वा हृष्टरूपा वभूवुः |
१३३ क
सूत उवाच:
महारथाः पार्थमशक्नुवन्त; स्तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१३३ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषमभिमन्युं निहत्य; हर्षान्मूढान्क्रोशतो धार्तराष्ट्रान् |
१३४ क
सूत उवाच:
क्रोधं मुक्तं सैन्धवे चार्जुनेन; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१३४ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं सैन्धवार्थे प्रतिज्ञां; प्रतिज्ञातां तद्वधाय़ार्जुनेन |
१३५ क
सूत उवाच:
सत्यां निस्तीर्णां शत्रुमध्ये च तेन; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१३५ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं श्रान्तहय़े धनञ्जय़े; मुक्त्वा हय़ान्पाय़यित्वोपवृत्तान् |
१३६ क
सूत उवाच:
पुनर्युक्त्वा वासुदेवं प्रय़ातं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१३६ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं वाहनेष्वाश्वसत्सु; रथोपस्थे तिष्ठता गाण्डिवेन |
१३७ क
सूत उवाच:
सर्वान्योधान्वारितानर्जुनेन; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१३७ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं नागवलैर्दुरुत्सहं; द्रोणानीकं युय़ुधानं प्रमथ्य |
१३८ क
सूत उवाच:
यातं वार्ष्णेय़ं यत्र तौ कृष्णपार्थौ; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१३८ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं कर्णमासाद्य मुक्तं; वधाद्भीमं कुत्सय़ित्वा वचोभिः |
१३९ क
सूत उवाच:
धनुष्कोट्या तुद्य कर्णेन वीरं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१३९ ख
सूत उवाच:
यदा द्रोणः कृतवर्मा कृपश्च; कर्णो द्रौणिर्मद्रराजश्च शूरः |
१४० क
सूत उवाच:
अमर्षय़न्सैन्धवं वध्यमानं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१४० ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं देवराजेन दत्तां; दिव्यां शक्तिं व्यंसितां माधवेन |
१४१ क
सूत उवाच:
घटोत्कचे राक्षसे घोररूपे; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१४१ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं कर्णघटोत्कचाभ्यां; युद्धे मुक्तां सूतपुत्रेण शक्तिम् |
१४२ क
सूत उवाच:
यय़ा वध्यः समरे सव्यसाची; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१४२ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं द्रोणमाचार्यमेकं; धृष्टद्युम्नेनाभ्यतिक्रम्य धर्मम् |
१४३ क
सूत उवाच:
रथोपस्थे प्राय़गतं विशस्तं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१४३ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं द्रौणिना द्वैरथस्थं; माद्रीपुत्रं नकुलं लोकमध्ये |
१४४ क
सूत उवाच:
समं युद्धे पाण्डवं युध्यमानं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१४४ ख
सूत उवाच:
यदा द्रोणे निहते द्रोणपुत्रो; नाराय़णं दिव्यमस्त्रं विकुर्वन् |
१४५ क
सूत उवाच:
नैषामन्तं गतवान्पाण्डवानां; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१४५ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं कर्णमत्यन्तशूरं; हतं पार्थेनाहवेष्वप्रधृष्यम् |
१४६ क
सूत उवाच:
तस्मिन्भ्रातृणां विग्रहे देवगुह्ये; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१४६ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं द्रोणपुत्रं कृपं च; दुःशासनं कृतवर्माणमुग्रम् |
१४७ क