सूत उवाच:
युधिष्ठिरं शून्यमधर्षय़न्तं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१४७ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं निहतं मद्रराजं; रणे शूरं धर्मराजेन सूत |
१४८ क
सूत उवाच:
सदा सङ्ग्रामे स्पर्धते यः स कृष्णं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१४८ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं कलहद्यूतमूलं; माय़ावलं सौवलं पाण्डवेन |
१४९ क
सूत उवाच:
हतं सङ्ग्रामे सहदेवेन पापं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१४९ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं श्रान्तमेकं शय़ानं; ह्रदं गत्वा स्तम्भय़ित्वा तदम्भः |
१५० क
सूत उवाच:
दुर्योधनं विरथं भग्नदर्पं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१५० ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं पाण्डवांस्तिष्ठमाना; न्गङ्गाह्रदे वासुदेवेन सार्धम् |
१५१ क
सूत उवाच:
अमर्षणं धर्षय़तः सुतं मे; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१५१ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं विविधांस्तात मार्गा; न्गदाय़ुद्धे मण्डलं सञ्चरन्तम् |
१५२ क
सूत उवाच:
मिथ्या हतं वासुदेवस्य वुद्ध्या; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१५२ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं द्रोणपुत्रादिभिस्तै; र्हतान्पाञ्चालान्द्रौपदेय़ांश्च सुप्तान् |
१५३ क
सूत उवाच:
कृतं वीभत्समय़शस्यं च कर्म; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१५३ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं भीमसेनानुय़ातेन; अश्वत्थाम्ना परमास्त्रं प्रय़ुक्तम् |
१५४ क
सूत उवाच:
क्रुद्धेनैषीकमवधीद्येन गर्भं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१५४ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं व्रह्मशिरोऽर्जुनेन; मुक्तं स्वस्तीत्यस्त्रमस्त्रेण शान्तम् |
१५५ क
सूत उवाच:
अश्वत्थाम्ना मणिरत्नं च दत्तं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१५५ ख
सूत उवाच:
यदाश्रौषं द्रोणपुत्रेण गर्भे; वैराट्या वै पात्यमाने महास्त्रे |
१५६ क
सूत उवाच:
द्वैपाय़नः केशवो द्रोणपुत्रं; परस्परेणाभिशापैः शशाप ||
१५६ ख
सूत उवाच:
शोच्या गान्धारी पुत्रपौत्रैर्विहीना; तथा वध्वः पितृभिर्भ्रातृभिश्च |
१५७ क
सूत उवाच:
कृतं कार्यं दुष्करं पाण्डवेय़ैः; प्राप्तं राज्यमसपत्नं पुनस्तैः ||
१५७ ख
सूत उवाच:
कष्टं युद्धे दश शेषाः श्रुता मे; त्रय़ोऽस्माकं पाण्डवानां च सप्त |
१५८ क
सूत उवाच:
द्व्यूना विंशतिराहताक्षौहिणीनां; तस्मिन्सङ्ग्रामे विग्रहे क्षत्रिय़ाणाम् ||
१५८ ख
सूत उवाच:
तमसा त्वभ्यवस्तीर्णो मोह आविशतीव माम् |
१५९ क
सूत उवाच:
सञ्ज्ञां नोपलभे सूत मनो विह्वलतीव मे ||
१५९ ख
सूत उवाच:
इत्युक्त्वा धृतराष्ट्रोऽथ विलप्य वहुदुःखितः |
१६० क
सूत उवाच:
मूर्च्छितः पुनराश्वस्तः सञ्जय़ं वाक्यमव्रवीत् ||
१६० ख
सूत उवाच:
सञ्जय़ैवङ्गते प्राणांस्त्यक्तुमिच्छामि माचिरम् |
१६१ क
सूत उवाच:
स्तोकं ह्यपि न पश्यामि फलं जीवितधारणे ||
१६१ ख
सूत उवाच:
तं तथावादिनं दीनं विलपन्तं महीपतिम् |
१६२ क
सूत उवाच:
गावल्गणिरिदं धीमान्महार्थं वाक्यमव्रवीत् ||
१६२ ख
सूत उवाच:
श्रुतवानसि वै राज्ञो महोत्साहान्महावलान् |
१६३ क
सूत उवाच:
द्वैपाय़नस्य वदतो नारदस्य च धीमतः ||
१६३ ख
सूत उवाच:
महत्सु राजवंशेषु गुणैः समुदितेषु च |
१६४ क
सूत उवाच:
जातान्दिव्यास्त्रविदुषः शक्रप्रतिमतेजसः ||
१६४ ख
सूत उवाच:
धर्मेण पृथिवीं जित्वा यज्ञैरिष्ट्वाप्तदक्षिणैः |
१६५ क
सूत उवाच:
अस्मिँल्लोके यशः प्राप्य ततः कालवशं गताः ||
१६५ ख
सूत उवाच:
वैन्यं महारथं वीरं सृञ्जय़ं जय़तां वरम् |
१६६ क
सूत उवाच:
सुहोत्रं रन्तिदेवं च कक्षीवन्तं तथौशिजम् ||
१६६ ख
सूत उवाच:
वाह्लीकं दमनं शैव्यं शर्यातिमजितं जितम् |
१६७ क
सूत उवाच:
विश्वामित्रममित्रघ्नमम्वरीषं महावलम् ||
१६७ ख
सूत उवाच:
मरुत्तं मनुमिक्ष्वाकुं गय़ं भरतमेव च |
१६८ क
सूत उवाच:
रामं दाशरथिं चैव शशविन्दुं भगीरथम् ||
१६८ ख
सूत उवाच:
यय़ातिं शुभकर्माणं देवैर्यो याजितः स्वय़म् |
१६९ क
सूत उवाच:
चैत्ययूपाङ्किता भूमिर्यस्येय़ं सवनाकरा ||
१६९ ख
सूत उवाच:
इति राज्ञां चतुर्विंशन्नारदेन सुरर्षिणा |
१७० क
सूत उवाच:
पुत्रशोकाभितप्ताय़ पुरा शैव्याय़ कीर्तिताः ||
१७० ख
सूत उवाच:
तेभ्यश्चान्ये गताः पूर्वं राजानो वलवत्तराः |
१७१ क
सूत उवाच:
महारथा महात्मानः सर्वैः समुदिता गुणैः ||
१७१ ख
सूत उवाच:
पूरुः कुरुर्यदुः शूरो विष्वगश्वो महाधृतिः |
१७२ क
सूत उवाच:
अनेना युवनाश्वश्च ककुत्स्थो विक्रमी रघुः ||
१७२ ख
सूत उवाच:
विजिती वीतिहोत्रश्च भवः श्वेतो वृहद्गुरुः |
१७३ क
सूत उवाच:
उशीनरः शतरथः कङ्को दुलिदुहो द्रुमः ||
१७३ ख
सूत उवाच:
दम्भोद्भवः परो वेनः सगरः सङ्कृतिर्निमिः |
१७४ क
सूत उवाच:
अजेय़ः परशुः पुण्ड्रः शम्भुर्देवावृधोऽनघः ||
१७४ ख
सूत उवाच:
देवाह्वय़ः सुप्रतिमः सुप्रतीको वृहद्रथः |
१७५ क
सूत उवाच:
महोत्साहो विनीतात्मा सुक्रतुर्नैषधो नलः ||
१७५ ख
सूत उवाच:
सत्यव्रतः शान्तभय़ः सुमित्रः सुवलः प्रभुः |
१७६ क
सूत उवाच:
जानुजङ्घोऽनरण्योऽर्कः प्रिय़भृत्यः शुभव्रतः ||
१७६ ख
सूत उवाच:
वलवन्धुर्निरामर्दः केतुशृङ्गो वृहद्वलः |
१७७ क
सूत उवाच:
धृष्टकेतुर्वृहत्केतुर्दीप्तकेतुर्निरामय़ः ||
१७७ ख
सूत उवाच:
अविक्षित्प्रवलो धूर्तः कृतवन्धुर्दृढेषुधिः |
१७८ क
सूत उवाच:
महापुराणः सम्भाव्यः प्रत्यङ्गः परहा श्रुतिः ||
१७८ ख
सूत उवाच:
एते चान्ये च वहवः शतशोऽथ सहस्रशः |
१७९ क
सूत उवाच:
श्रूय़न्तेऽय़ुतशश्चान्ये सङ्ख्याताश्चापि पद्मशः ||
१७९ ख
सूत उवाच:
हित्वा सुविपुलान्भोगान्वुद्धिमन्तो महावलाः |
१८० क
सूत उवाच:
राजानो निधनं प्राप्तास्तव पुत्रैर्महत्तमाः ||
१८० ख
सूत उवाच:
येषां दिव्यानि कर्माणि विक्रमस्त्याग एव च |
१८१ क
सूत उवाच:
माहात्म्यमपि चास्तिक्यं सत्यता शौचमार्जवम् ||
१८१ ख
सूत उवाच:
विद्वद्भिः कथ्यते लोके पुराणैः कविसत्तमैः |
१८२ क
सूत उवाच:
सर्वर्द्धिगुणसम्पन्नास्ते चापि निधनं गताः ||
१८२ ख
सूत उवाच:
तव पुत्रा दुरात्मानः प्रतप्ताश्चैव मन्युना |
१८३ क
सूत उवाच:
लुव्धा दुर्वृत्तभूय़िष्ठा न ताञ्शोचितुमर्हसि ||
१८३ ख
सूत उवाच:
श्रुतवानसि मेधावी वुद्धिमान्प्राज्ञसंमतः |
१८४ क
सूत उवाच:
येषां शास्त्रानुगा वुद्धिर्न ते मुह्यन्ति भारत ||
१८४ ख
सूत उवाच:
निग्रहानुग्रहौ चापि विदितौ ते नराधिप |
१८५ क
सूत उवाच:
नात्यन्तमेवानुवृत्तिः श्रूय़ते पुत्ररक्षणे ||
१८५ ख
सूत उवाच:
भवितव्यं तथा तच्च नातः शोचितुमर्हसि |
१८६ क
सूत उवाच:
दैवं प्रज्ञाविशेषेण को निवर्तितुमर्हति ||
१८६ ख
सूत उवाच:
विधातृविहितं मार्गं न कश्चिदतिवर्तते |
१८७ क
सूत उवाच:
कालमूलमिदं सर्वं भावाभावौ सुखासुखे ||
१८७ ख
सूत उवाच:
कालः पचति भूतानि कालः संहरति प्रजाः |
१८८ क
सूत उवाच:
निर्दहन्तं प्रजाः कालं कालः शमय़ते पुनः ||
१८८ ख
सूत उवाच:
कालो विकुरुते भावान्सर्वाँल्लोके शुभाशुभान् |
१८९ क
सूत उवाच:
कालः सङ्क्षिपते सर्वाः प्रजा विसृजते पुनः |
१८९ ख
सूत उवाच:
कालः सर्वेषु भूतेषु चरत्यविधृतः समः ||
१८९ ग
सूत उवाच:
अतीतानागता भावा ये च वर्तन्ति साम्प्रतम् |
१९० क
सूत उवाच:
तान्कालनिर्मितान्वुद्ध्वा न सञ्ज्ञां हातुमर्हसि ||
१९० ख
सूत उवाच:
अत्रोपनिषदं पुण्यां कृष्णद्वैपाय़नोऽव्रवीत् |
१९१ क
सूत उवाच:
भारताध्ययनात्पुण्यादपि पादमधीय़तः |
१९१ ख
सूत उवाच:
श्रद्दधानस्य पूय़न्ते सर्वपापान्यशेषतः ||
१९१ ग
सूत उवाच:
देवर्षय़ो ह्यत्र पुण्या व्रह्मराजर्षय़स्तथा |
१९२ क
सूत उवाच:
कीर्त्यन्ते शुभकर्माणस्तथा यक्षमहोरगाः ||
१९२ ख
सूत उवाच:
भगवान्वासुदेवश्च कीर्त्यतेऽत्र सनातनः |
१९३ क
सूत उवाच:
स हि सत्यमृतं चैव पवित्रं पुण्यमेव च ||
१९३ ख
सूत उवाच:
शाश्वतं व्रह्म परमं ध्रुवं ज्योतिः सनातनम् |
१९४ क
सूत उवाच:
यस्य दिव्यानि कर्माणि कथय़न्ति मनीषिणः ||
१९४ ख
सूत उवाच:
असत्सत्सदसच्चैव यस्माद्देवात्प्रवर्तते |
१९५ क
सूत उवाच:
सन्ततिश्च प्रवृत्तिश्च जन्म मृत्युः पुनर्भवः ||
१९५ ख
सूत उवाच:
अध्यात्मं श्रूय़ते यच्च पञ्चभूतगुणात्मकम् |
१९६ क