chevron_left अनुशासन पर्व अध्याय १०
युधिष्ठिर उवाच:
मित्रसौहृदभावेन उपदेशं करोति यः |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
जात्यावरस्य राजर्षे दोषस्तस्य भवेन्न वा ||
१ ख
युधिष्ठिर उवाच:
एतदिच्छामि तत्त्वेन व्याख्यातुं वै पितामह |
२ क
युधिष्ठिर उवाच:
सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य यत्र मुह्यन्ति मानवाः ||
२ ख
भीष्म उवाच:
अत्र ते वर्तय़िष्यामि शृणु राजन्यथागमम् |
३ क
भीष्म उवाच:
ऋषीणां वदतां पूर्वं श्रुतमासीद्यथा मय़ा ||
३ ख
भीष्म उवाच:
उपदेशो न कर्तव्यो जातिहीनस्य कस्यचित् |
४ क
भीष्म उवाच:
उपदेशे महान्दोष उपाध्याय़स्य भाष्यते ||
४ ख
भीष्म उवाच:
निदर्शनमिदं राजञ्शृणु मे भरतर्षभ |
५ क
भीष्म उवाच:
दुरुक्तवचने राजन्यथा पूर्वं युधिष्ठिर |
५ ख
भीष्म उवाच:
व्रह्माश्रमपदे वृत्तं पार्श्वे हिमवतः शुभे ||
५ ग
भीष्म उवाच:
तत्राश्रमपदं पुण्यं नानावृक्षगणाय़ुतम् |
६ क
भीष्म उवाच:
वहुगुल्मलताकीर्णं मृगद्विजनिषेवितम् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
सिद्धचारणसङ्घुष्टं रम्यं पुष्पितकाननम् |
७ क
भीष्म उवाच:
व्रतिभिर्वहुभिः कीर्णं तापसैरुपशोभितम् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
व्राह्मणैश्च महाभागैः सूर्यज्वलनसंनिभैः |
८ क
भीष्म उवाच:
निय़मव्रतसम्पन्नैः समाकीर्णं तपस्विभिः |
८ ख
भीष्म उवाच:
दीक्षितैर्भरतश्रेष्ठ यताहारैः कृतात्मभिः ||
८ ग
भीष्म उवाच:
वेदाध्ययनघोषैश्च नादितं भरतर्षभ |
९ क
भीष्म उवाच:
वालखिल्यैश्च वहुभिर्यतिभिश्च निषेवितम् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
तत्र कश्चित्समुत्साहं कृत्वा शूद्रो दय़ान्वितः |
१० क
भीष्म उवाच:
आगतो ह्याश्रमपदं पूजितश्च तपस्विभिः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
तांस्तु दृष्ट्वा मुनिगणान्देवकल्पान्महौजसः |
११ क
भीष्म उवाच:
वहतो विविधा दीक्षाः सम्प्रहृष्यत भारत ||
११ ख
भीष्म उवाच:
अथास्य वुद्धिरभवत्तपस्ये भरतर्षभ |
१२ क
भीष्म उवाच:
ततोऽव्रवीत्कुलपतिं पादौ सङ्गृह्य भारत ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
भवत्प्रसादादिच्छामि धर्मं चर्तुं द्विजर्षभ |
१३ क
भीष्म उवाच:
तन्मां त्वं भगवन्वक्तुं प्रव्राजय़ितुमर्हसि ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
वर्णावरोऽहं भगवञ्शूद्रो जात्यास्मि सत्तम |
१४ क
भीष्म उवाच:
शुश्रूषां कर्तुमिच्छामि प्रपन्नाय़ प्रसीद मे ||
१४ ख
कुलपतिरु उवाच:
न शक्यमिह शूद्रेण लिङ्गमाश्रित्य वर्तितुम् |
१५ क
कुलपतिरु उवाच:
आस्यतां यदि ते वुद्धिः शुश्रूषानिरतो भव ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्तस्तु मुनिना स शूद्रोऽचिन्तय़न्नृप |
१६ क
भीष्म उवाच:
कथमत्र मय़ा कार्यं श्रद्धा धर्मे परा च मे |
१६ ख
भीष्म उवाच:
विज्ञातमेवं भवतु करिष्ये प्रिय़मात्मनः ||
१६ ग
भीष्म उवाच:
गत्वाश्रमपदाद्दूरमुटजं कृतवांस्तु सः |
१७ क
भीष्म उवाच:
तत्र वेदिं च भूमिं च देवताय़तनानि च |
१७ ख
भीष्म उवाच:
निवेश्य भरतश्रेष्ठ निय़मस्थोऽभवत्सुखम् ||
१७ ग
भीष्म उवाच:
अभिषेकांश्च निय़मान्देवताय़तनेषु च |
१८ क
भीष्म उवाच:
वलिं च कृत्वा हुत्वा च देवतां चाप्यपूजय़त् ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
सङ्कल्पनिय़मोपेतः फलाहारो जितेन्द्रिय़ः |
१९ क
भीष्म उवाच:
नित्यं संनिहिताभिश्च ओषधीभिः फलैस्तथा ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
अतिथीन्पूजय़ामास यथावत्समुपागतान् |
२० क
भीष्म उवाच:
एवं हि सुमहान्कालो व्यत्यक्रामत्स तस्य वै ||
२० ख
भीष्म उवाच:
अथास्य मुनिरागच्छत्सङ्गत्या वै तमाश्रमम् |
२१ क
भीष्म उवाच:
सम्पूज्य स्वागतेनर्षिं विधिवत्पर्यतोषय़त् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
अनुकूलाः कथाः कृत्वा यथावत्पर्यपृच्छत |
२२ क
भीष्म उवाच:
ऋषिः परमतेजस्वी धर्मात्मा संय़तेन्द्रिय़ः ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
एवं स वहुशस्तस्य शूद्रस्य भरतर्षभ |
२३ क
भीष्म उवाच:
सोऽगच्छदाश्रममृषिः शूद्रं द्रष्टुं नरर्षभ ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
अथ तं तापसं शूद्रः सोऽव्रवीद्भरतर्षभ |
२४ क
भीष्म उवाच:
पितृकार्यं करिष्यामि तत्र मेऽनुग्रहं कुरु ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
वाढमित्येव तं विप्र उवाच भरतर्षभ |
२५ क
भीष्म उवाच:
शुचिर्भूत्वा स शूद्रस्तु तस्यर्षेः पाद्यमानय़त् ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
अथ दर्भांश्च वन्याश्च ओषधीर्भरतर्षभ |
२६ क
भीष्म उवाच:
पवित्रमासनं चैव वृसीं च समुपानय़त् ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
अथ दक्षिणमावृत्य वृसीं परमशीर्षिकाम् |
२७ क
भीष्म उवाच:
कृतामन्याय़तो दृष्ट्वा ततस्तमृषिरव्रवीत् ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
कुरुष्वैतां पूर्वशीर्षां भव चोदङ्मुखः शुचिः |
२८ क
भीष्म उवाच:
स च तत्कृतवाञ्शूद्रः सर्वं यदृषिरव्रवीत् ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
यथोपदिष्टं मेधावी दर्भादींस्तान्यथातथम् |
२९ क
भीष्म उवाच:
हव्यकव्यविधिं कृत्स्नमुक्तं तेन तपस्विना ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
ऋषिणा पितृकार्ये च स च धर्मपथे स्थितः |
३० क
भीष्म उवाच:
पितृकार्ये कृते चापि विसृष्टः स जगाम ह ||
३० ख
भीष्म उवाच:
अथ दीर्घस्य कालस्य स तप्यञ्शूद्रतापसः |
३१ क
भीष्म उवाच:
वने पञ्चत्वमगमत्सुकृतेन च तेन वै |
३१ ख
भीष्म उवाच:
अजाय़त महाराजराजवंशे महाद्युतिः ||
३१ ग
भीष्म उवाच:
तथैव स ऋषिस्तात कालधर्ममवाप्य ह |
३२ क
भीष्म उवाच:
पुरोहितकुले विप्र आजातो भरतर्षभ ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
एवं तौ तत्र सम्भूतावुभौ शूद्रमुनी तदा |
३३ क
भीष्म उवाच:
क्रमेण वर्धितौ चापि विद्यासु कुशलावुभौ ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
अथर्ववेदे वेदे च वभूवर्षिः सुनिश्चितः |
३४ क
भीष्म उवाच:
कल्पप्रय़ोगे चोत्पन्ने ज्योतिषे च परं गतः |
३४ ख
भीष्म उवाच:
सख्ये चापि परा प्रीतिस्तय़ोश्चापि व्यवर्धत ||
३४ ग
भीष्म उवाच:
पितर्युपरते चापि कृतशौचः स भारत |
३५ क
भीष्म उवाच:
अभिषिक्तः प्रकृतिभी राजपुत्रः स पार्थिवः |
३५ ख
भीष्म उवाच:
अभिषिक्तेन स ऋषिरभिषिक्तः पुरोहितः ||
३५ ग
भीष्म उवाच:
स तं पुरोधाय़ सुखमवसद्भरतर्षभ |
३६ क
भीष्म उवाच:
राज्यं शशास धर्मेण प्रजाश्च परिपालय़न् ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
पुण्याहवाचने नित्यं धर्मकार्येषु चासकृत् |
३७ क
भीष्म उवाच:
उत्स्मय़न्प्राहसच्चापि दृष्ट्वा राजा पुरोहितम् |
३७ ख
भीष्म उवाच:
एवं स वहुशो राजन्पुरोधसमुपाहसत् ||
३७ ग
भीष्म उवाच:
लक्षय़ित्वा पुरोधास्तु वहुशस्तं नराधिपम् |
३८ क
भीष्म उवाच:
उत्स्मय़न्तं च सततं दृष्ट्वासौ मन्युमानभूत् ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
अथ शून्ये पुरोधास्तु सह राज्ञा समागतः |
३९ क
भीष्म उवाच:
कथाभिरनुकूलाभी राजानमभिरामय़त् ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽव्रवीन्नरेन्द्रं स पुरोधा भरतर्षभ |
४० क
भीष्म उवाच:
वरमिच्छाम्यहं त्वेकं त्वय़ा दत्तं महाद्युते ||
४० ख
राजो उवाच:
वराणां ते शतं दद्यां किमुतैकं द्विजोत्तम |
४१ क
राजो उवाच:
स्नेहाच्च वहुमानाच्च नास्त्यदेय़ं हि मे तव ||
४१ ख
पुरोहित उवाच:
एकं वै वरमिच्छामि यदि तुष्टोऽसि पार्थिव |
४२ क
पुरोहित उवाच:
यद्ददासि महाराज सत्यं तद्वद मानृतम् ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
वाढमित्येव तं राजा प्रत्युवाच युधिष्ठिर |
४३ क
भीष्म उवाच:
यदि ज्ञास्यामि वक्ष्यामि अजानन्न तु संवदे ||
४३ ख
पुरोहित उवाच:
पुण्याहवाचने नित्यं धर्मकृत्येषु चासकृत् |
४४ क
पुरोहित उवाच:
शान्तिहोमेषु च सदा किं त्वं हससि वीक्ष्य माम् ||
४४ ख
पुरोहित उवाच:
सव्रीडं वै भवति हि मनो मे हसता त्वय़ा |
४५ क
पुरोहित उवाच:
कामय़ा शापितो राजन्नान्यथा वक्तुमर्हसि ||
४५ ख
पुरोहित उवाच:
भाव्यं हि कारणेनात्र न ते हास्यमकारणम् |
४६ क
पुरोहित उवाच:
कौतूहलं मे सुभृशं तत्त्वेन कथय़स्व मे ||
४६ ख