धृतराष्ट्र उवाच:
व्यवहाराश्च ते तात नित्यमाप्तैरधिष्ठिताः |
१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
योज्यास्तुष्टैर्हितै राजन्नित्यं चारैरनुष्ठिताः ||
१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
परिमाणं विदित्वा च दण्डं दण्ड्येषु भारत |
२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रणय़ेय़ुर्यथान्याय़ं पुरुषास्ते युधिष्ठिर ||
२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आदानरुचय़श्चैव परदाराभिमर्शकाः |
३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
उग्रदण्डप्रधानाश्च मिथ्या व्याहारिणस्तथा ||
३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आक्रोष्टारश्च लुव्धाश्च हन्तारः साहसप्रिय़ाः |
४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सभाविहारभेत्तारो वर्णानां च प्रदूषकाः |
४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
हिरण्यदण्ड्या वध्याश्च कर्तव्या देशकालतः ||
४ ग
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रातरेव हि पश्येथा ये कुर्युर्व्ययकर्म ते |
५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अलङ्कारमथो भोज्यमत ऊर्ध्वं समाचरेः ||
५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
पश्येथाश्च ततो योधान्सदा त्वं परिहर्षय़न् |
६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
दूतानां च चराणां च प्रदोषस्ते सदा भवेत् ||
६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सदा चापररात्रं ते भवेत्कार्यार्थनिर्णय़े |
७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
मध्यरात्रे विहारस्ते मध्याह्ने च सदा भवेत् ||
७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सर्वे त्वात्ययिकाः कालाः कार्याणां भरतर्षभ |
८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तथैवालङ्कृतः काले तिष्ठेथा भूरिदक्षिणः |
८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
चक्रवत्कर्मणां तात पर्याय़ो ह्येष नित्यशः ||
८ ग
धृतराष्ट्र उवाच:
कोशस्य सञ्चय़े यत्नं कुर्वीथा न्याय़तः सदा |
९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
द्विविधस्य महाराज विपरीतं विवर्जय़ेः ||
९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
चारैर्विदित्वा शत्रूंश्च ये ते राज्यान्तराय़िणः |
१० क
धृतराष्ट्र उवाच:
तानाप्तैः पुरुषैर्दूराद्घातय़ेथाः परस्परम् ||
१० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
कर्मदृष्ट्याथ भृत्यांस्त्वं वरय़ेथाः कुरूद्वह |
११ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कारय़ेथाश्च कर्माणि युक्ताय़ुक्तैरधिष्ठितैः ||
११ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सेनाप्रणेता च भवेत्तव तात दृढव्रतः |
१२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
शूरः क्लेशसहश्चैव प्रिय़श्च तव मानवः ||
१२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सर्वे जानपदाश्चैव तव कर्माणि पाण्डव |
१३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पौरोगवाश्च सभ्याश्च कुर्युर्ये व्यवहारिणः ||
१३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
स्वरन्ध्रं पररन्ध्रं च स्वेषु चैव परेषु च |
१४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
उपलक्षय़ितव्यं ते नित्यमेव युधिष्ठिर ||
१४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
देशान्तरस्थाश्च नरा विक्रान्ताः सर्वकर्मसु |
१५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
मात्राभिरनुरूपाभिरनुग्राह्या हितास्त्वय़ा ||
१५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
गुणार्थिनां गुणः कार्यो विदुषां ते जनाधिप |
१६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अविचाल्याश्च ते ते स्युर्यथा मेरुर्महागिरिः ||
१६ ख