chevron_left द्रोण पर्व अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच:
शृणु दिव्यानि कर्माणि वासुदेवस्य सञ्जय़ |
१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कृतवान्यानि गोविन्दो यथा नान्यः पुमान्क्वचित् ||
१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
संवर्धता गोपकुले वालेनैव महात्मना |
२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
विख्यापितं वलं वाह्वोस्त्रिषु लोकेषु सञ्जय़ ||
२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
उच्चैःश्रवस्तुल्यवलं वाय़ुवेगसमं जवे |
३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
जघान हय़राजं यो यमुनावनवासिनम् ||
३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दानवं घोरकर्माणं गवां मृत्युमिवोत्थितम् |
४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वृषरूपधरं वाल्ये भुजाभ्यां निजघान ह ||
४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रलम्वं नरकं जम्भं पीठं चापि महासुरम् |
५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
मुरुं चाचलसङ्काशमवधीत्पुष्करेक्षणः ||
५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तथा कंसो महातेजा जरासन्धेन पालितः |
६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
विक्रमेणैव कृष्णेन सगणः शातितो रणे ||
६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सुनामा नाम विक्रान्तः समग्राक्षौहिणीपतिः |
७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भोजराजस्य मध्यस्थो भ्राता कंसस्य वीर्यवान् ||
७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
वलदेवद्वितीय़ेन कृष्णेनामित्रघातिना |
८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तरस्वी समरे दग्धः ससैन्यः शूरसेनराट् ||
८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दुर्वासा नाम विप्रर्षिस्तथा परमकोपनः |
९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
आराधितः सदारेण स चास्मै प्रददौ वरान् ||
९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तथा गान्धारराजस्य सुतां वीरः स्वय़ंवरे |
१० क
धृतराष्ट्र उवाच:
निर्जित्य पृथिवीपालानवहत्पुष्करेक्षणः ||
१० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अमृष्यमाणा राजानो यस्य जात्या हय़ा इव |
११ क
धृतराष्ट्र उवाच:
रथे वैवाहिके युक्ताः प्रतोदेन कृतव्रणाः ||
११ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
जरासन्धं महावाहुमुपाय़ेन जनार्दनः |
१२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
परेण घातय़ामास पृथगक्षौहिणीपतिम् ||
१२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
चेदिराजं च विक्रान्तं राजसेनापतिं वली |
१३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अर्घे विवदमानं च जघान पशुवत्तदा ||
१३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सौभं दैत्यपुरं स्वस्थं शाल्वगुप्तं दुरासदम् |
१४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
समुद्रकुक्षौ विक्रम्य पातय़ामास माधवः ||
१४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अङ्गान्वङ्गान्कलिङ्गांश्च मागधान्काशिकोसलान् |
१५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वत्सगर्गकरूषांश्च पुण्ड्रांश्चाप्यजय़द्रणे ||
१५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आवन्त्यान्दाक्षिणात्यांश्च पार्वतीय़ान्दशेरकान् |
१६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
काश्मीरकानौरसकान्पिशाचांश्च समन्दरान् ||
१६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
काम्वोजान्वाटधानांश्च चोलान्पाण्ड्यांश्च सञ्जय़ |
१७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
त्रिगर्तान्मालवांश्चैव दरदांश्च सुदुर्जय़ान् ||
१७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
नानादिग्भ्यश्च सम्प्राप्तान्व्रातानश्वशकान्प्रति |
१८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
जितवान्पुण्डरीकाक्षो यवनांश्च सहानुगान् ||
१८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रविश्य मकरावासं यादोभिरभिसंवृतम् |
१९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
जिगाय़ वरुणं युद्धे सलिलान्तर्गतं पुरा ||
१९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
युधि पञ्चजनं हत्वा पातालतलवासिनम् |
२० क
धृतराष्ट्र उवाच:
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो दिव्यं शङ्खमवाप्तवान् ||
२० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
खाण्डवे पार्थसहितस्तोषय़ित्वा हुताशनम् |
२१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
आग्नेय़मस्त्रं दुर्धर्षं चक्रं लेभे महावलः ||
२१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
वैनतेय़ं समारुह्य त्रासय़ित्वामरावतीम् |
२२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
महेन्द्रभवनाद्वीरः पारिजातमुपानय़त् ||
२२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तच्च मर्षितवाञ्शक्रो जानंस्तस्य पराक्रमम् |
२३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
राज्ञां चाप्यजितं कञ्चित्कृष्णेनेह न शुश्रुम ||
२३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यच्च तन्महदाश्चर्यं सभाय़ां मम सञ्जय़ |
२४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कृतवान्पुण्डरीकाक्षः कस्तदन्य इहार्हति ||
२४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यच्च भक्त्या प्रपन्नोऽहमद्राक्षं कृष्णमीश्वरम् |
२५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तन्मे सुविदितं सर्वं प्रत्यक्षमिव चागमत् ||
२५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
नान्तो विक्रमय़ुक्तस्य वुद्ध्या युक्तस्य वा पुनः |
२६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कर्मणः शक्यते गन्तुं हृषीकेशस्य सञ्जय़ ||
२६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तथा गदश्च साम्वश्च प्रद्युम्नोऽथ विदूरथः |
२७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
आगावहोऽनिरुद्धश्च चारुदेष्णश्च सारणः ||
२७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
उल्मुको निशठश्चैव झल्ली वभ्रुश्च वीर्यवान् |
२८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पृथुश्च विपृथुश्चैव समीकोऽथारिमेजय़ः ||
२८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एते वै वलवन्तश्च वृष्णिवीराः प्रहारिणः |
२९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कथञ्चित्पाण्डवानीकं श्रय़ेय़ुः समरे स्थिताः ||
२९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आहूता वृष्णिवीरेण केशवेन महात्मना |
३० क
धृतराष्ट्र उवाच:
ततः संशय़ितं सर्वं भवेदिति मतिर्मम ||
३० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
नागाय़ुतवलो वीरः कैलासशिखरोपमः |
३१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वनमाली हली रामस्तत्र यत्र जनार्दनः ||
३१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यमाहुः सर्वपितरं वासुदेवं द्विजातय़ः |
३२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अपि वा ह्येष पाण्डूनां योत्स्यतेऽर्थाय़ सञ्जय़ ||
३२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
स यदा तात संनह्येत्पाण्डवार्थाय़ केशवः |
३३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
न तदा प्रत्यनीकेषु भविता तस्य कश्चन ||
३३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यदि स्म कुरवः सर्वे जय़ेय़ुः सर्वपाण्डवान् |
३४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वार्ष्णेय़ोऽर्थाय़ तेषां वै गृह्णीय़ाच्छस्त्रमुत्तमम् ||
३४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ततः सर्वान्नरव्याघ्रो हत्वा नरपतीन्रणे |
३५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कौरवांश्च महावाहुः कुन्त्यै दद्यात्स मेदिनीम् ||
३५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यस्य यन्ता हृषीकेशो योद्धा यस्य धनञ्जय़ः |
३६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
रथस्य तस्य कः सङ्ख्ये प्रत्यनीको भवेद्रथः ||
३६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
न केनचिदुपाय़ेन कुरूणां दृश्यते जय़ः |
३७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्मान्मे सर्वमाचक्ष्व यथा युद्धमवर्तत ||
३७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अर्जुनः केशवस्यात्मा कृष्णोऽप्यात्मा किरीटिनः |
३८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अर्जुने विजय़ो नित्यं कृष्णे कीर्तिश्च शाश्वती ||
३८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
प्राधान्येन हि भूय़िष्ठममेय़ाः केशवे गुणाः |
३९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
मोहाद्दुर्योधनः कृष्णं यन्न वेत्तीह माधवम् ||
३९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
मोहितो दैवय़ोगेन मृत्युपाशपुरस्कृतः |
४० क
धृतराष्ट्र उवाच:
न वेद कृष्णं दाशार्हमर्जुनं चैव पाण्डवम् ||
४० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
पूर्वदेवौ महात्मानौ नरनाराय़णावुभौ |
४१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
एकात्मानौ द्विधाभूतौ दृश्येते मानवैर्भुवि ||
४१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
मनसापि हि दुर्धर्षौ सेनामेतां यशस्विनौ |
४२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
नाशय़ेतामिहेच्छन्तौ मानुषत्वात्तु नेच्छतः ||
४२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
युगस्येव विपर्यासो लोकानामिव मोहनम् |
४३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भीष्मस्य च वधस्तात द्रोणस्य च महात्मनः ||
४३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
न ह्येव व्रह्मचर्येण न वेदाध्ययनेन च |
४४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
न क्रिय़ाभिर्न शस्त्रेण मृत्योः कश्चिद्विमुच्यते ||
४४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
लोकसम्भावितौ वीरौ कृतास्त्रौ युद्धदुर्मदौ |
४५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा किं नु जीवामि सञ्जय़ ||
४५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यां तां श्रिय़मसूय़ामः पुरा यातां युधिष्ठिरे |
४६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अद्य तामनुजानीमो भीष्मद्रोणवधेन च ||
४६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तथा च मत्कृते प्राप्तः कुरूणामेष सङ्क्षय़ः |
४७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पक्वानां हि वधे सूत वज्राय़न्ते तृणान्यपि ||
४७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अनन्यमिदमैश्वर्यं लोके प्राप्तो युधिष्ठिरः |
४८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
यस्य कोपान्महेष्वासौ भीष्मद्रोणौ निपातितौ ||
४८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
प्राप्तः प्रकृतितो धर्मो नाधर्मो मानवान्प्रति |
४९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
क्रूरः सर्वविनाशाय़ कालः समतिवर्तते ||
४९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अन्यथा चिन्तिता ह्यर्था नरैस्तात मनस्विभिः |
५० क
धृतराष्ट्र उवाच:
अन्यथैव हि गच्छन्ति दैवादिति मतिर्मम ||
५० ख