chevron_left अनुशासन पर्व अध्याय ११०
भीष्म उवाच:
रुद्रं नित्यं प्रणमते देवदानवसंमतम् |
५० क
भीष्म उवाच:
स तस्मै दर्शनं प्राप्तो दिवसे दिवसे भवेत् ||
५० ख
भीष्म उवाच:
दिवसे द्वादशे यस्तु प्राप्ते वै प्राशते हविः |
५१ क
भीष्म उवाच:
सदा द्वादशमासान्वै सर्वमेधफलं लभेत् ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
आदित्यैर्द्वादशैस्तस्य विमानं संविधीय़ते |
५२ क
भीष्म उवाच:
मणिमुक्ताप्रवालैश्च महार्हैरुपशोभितम् ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
हंसमालापरिक्षिप्तं नागवीथीसमाकुलम् |
५३ क
भीष्म उवाच:
मय़ूरैश्चक्रवाकैश्च कूजद्भिरुपशोभितम् ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
अट्टैर्महद्भिः संय़ुक्तं व्रह्मलोके प्रतिष्ठितम् |
५४ क
भीष्म उवाच:
नित्यमावसते राजन्नरनारीसमावृतम् |
५४ ख
भीष्म उवाच:
ऋषिरेवं महाभागस्त्वङ्गिराः प्राह धर्मवित् ||
५४ ग
भीष्म उवाच:
त्रय़ोदशे तु दिवसे यः प्राप्ते प्राशते हविः |
५५ क
भीष्म उवाच:
सदा द्वादश मासान्वै देवसत्रफलं लभेत् ||
५५ ख
भीष्म उवाच:
रक्तपद्मोदय़ं नाम विमानं साधय़ेन्नरः |
५६ क
भीष्म उवाच:
जातरूपप्रय़ुक्तं च रत्नसञ्चय़भूषितम् ||
५६ ख
भीष्म उवाच:
देवकन्याभिराकीर्णं दिव्याभरणभूषितम् |
५७ क
भीष्म उवाच:
पुण्यगन्धोदय़ं दिव्यं वाय़व्यैरुपशोभितम् ||
५७ ख
भीष्म उवाच:
तत्र शङ्कुपताकं च युगान्तं कल्पमेव च |
५८ क
भीष्म उवाच:
अय़ुताय़ुतं तथा पद्मं समुद्रं च तथा वसेत् ||
५८ ख
भीष्म उवाच:
गीतगन्धर्वघोषैश्च भेरीपणवनिस्वनैः |
५९ क
भीष्म उवाच:
सदा प्रमुदितस्ताभिर्देवकन्याभिरीड्यते ||
५९ ख
भीष्म उवाच:
चतुर्दशे तु दिवसे यः पूर्णे प्राशते हविः |
६० क
भीष्म उवाच:
सदा द्वादश मासान्वै महामेधफलं लभेत् ||
६० ख
भीष्म उवाच:
अनिर्देश्यवय़ोरूपा देवकन्याः स्वलङ्कृताः |
६१ क
भीष्म उवाच:
मृष्टतप्ताङ्गदधरा विमानैरनुय़ान्ति तम् ||
६१ ख
भीष्म उवाच:
कलहंसविनिर्घोषैर्नूपुराणां च निस्वनैः |
६२ क
भीष्म उवाच:
काञ्चीनां च समुत्कर्षैस्तत्र तत्र विवोध्यते ||
६२ ख
भीष्म उवाच:
देवकन्यानिवासे च तस्मिन्वसति मानवः |
६३ क
भीष्म उवाच:
जाह्नवीवालुकाकीर्णे पूर्णं संवत्सरं नरः ||
६३ ख
भीष्म उवाच:
यस्तु पक्षे गते भुङ्क्ते एकभक्तं जितेन्द्रिय़ः |
६४ क
भीष्म उवाच:
सदा दादश मासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् |
६४ ख
भीष्म उवाच:
राजसूय़सहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ||
६४ ग
भीष्म उवाच:
यानमारोहते नित्यं हंसवर्हिणसेवितम् |
६५ क
भीष्म उवाच:
मणिमण्डलकैश्चित्रं जातरूपसमावृतम् ||
६५ ख
भीष्म उवाच:
दिव्याभरणशोभाभिर्वरस्त्रीभिरलङ्कृतम् |
६६ क
भीष्म उवाच:
एकस्तम्भं चतुर्द्वारं सप्तभौमं सुमङ्गलम् |
६६ ख
भीष्म उवाच:
वैजय़न्तीसहस्रैश्च शोभितं गीतनिस्वनैः ||
६६ ग
भीष्म उवाच:
दिव्यं दिव्यगुणोपेतं विमानमधिरोहति |
६७ क
भीष्म उवाच:
मणिमुक्ताप्रवालैश्च भूषितं वैद्युतप्रभम् |
६७ ख
भीष्म उवाच:
वसेद्युगसहस्रं च खड्गकुञ्जरवाहनः ||
६७ ग
भीष्म उवाच:
षोडशे दिवसे यस्तु सम्प्राप्ते प्राशते हविः |
६८ क
भीष्म उवाच:
सदा द्वादश मासान्वै सोमय़ज्ञफलं लभेत् ||
६८ ख
भीष्म उवाच:
सोमकन्यानिवासेषु सोऽध्यावसति नित्यदा |
६९ क
भीष्म उवाच:
सौम्यगन्धानुलिप्तश्च कामचारगतिर्भवेत् ||
६९ ख
भीष्म उवाच:
सुदर्शनाभिर्नारीभिर्मधुराभिस्तथैव च |
७० क
भीष्म उवाच:
अर्च्यते वै विमानस्थः कामभोगैश्च सेव्यते ||
७० ख
भीष्म उवाच:
फलं पद्मशतप्रख्यं महाकल्पं दशाधिकम् |
७१ क
भीष्म उवाच:
आवर्तनानि चत्वारि सागरे यात्यसौ नरः ||
७१ ख
भीष्म उवाच:
दिवसे सप्तदशमे यः प्राप्ते प्राशते हविः |
७२ क
भीष्म उवाच:
सदा द्वादश मासान्वै जुह्वानो जातवेदसम् ||
७२ ख
भीष्म उवाच:
स्थानं वारुणमैन्द्रं च रौद्रं चैवाधिगच्छति |
७३ क
भीष्म उवाच:
मारुतौशनसे चैव व्रह्मलोकं च गच्छति ||
७३ ख
भीष्म उवाच:
तत्र दैवतकन्याभिरासनेनोपचर्यते |
७४ क
भीष्म उवाच:
भूर्भुवं चापि देवर्षिं विश्वरूपमवेक्षते ||
७४ ख
भीष्म उवाच:
तत्र देवाधिदेवस्य कुमार्यो रमय़न्ति तम् |
७५ क
भीष्म उवाच:
द्वात्रिंशद्रूपधारिण्यो मधुराः समलङ्कृताः ||
७५ ख
भीष्म उवाच:
चन्द्रादित्यावुभौ यावद्गगने चरतः प्रभो |
७६ क
भीष्म उवाच:
तावच्चरत्यसौ वीरः सुधामृतरसाशनः ||
७६ ख
भीष्म उवाच:
अष्टादशे तु दिवसे प्राश्नीय़ादेकभोजनम् |
७७ क
भीष्म उवाच:
सदा द्वादश मासान्वै सप्त लोकान्स पश्यति ||
७७ ख
भीष्म उवाच:
रथैः सनन्दिघोषैश्च पृष्ठतः सोऽनुगम्यते |
७८ क
भीष्म उवाच:
देवकन्याधिरूढैस्तु भ्राजमानैः स्वलङ्कृतैः ||
७८ ख
भीष्म उवाच:
व्याघ्रसिंहप्रय़ुक्तं च मेघस्वननिनादितम् |
७९ क
भीष्म उवाच:
विमानमुत्तमं दिव्यं सुसुखी ह्यधिरोहति ||
७९ ख
भीष्म उवाच:
तत्र कल्पसहस्रं स कान्ताभिः सह मोदते |
८० क
भीष्म उवाच:
सुधारसं च भुञ्जीत अमृतोपममुत्तमम् ||
८० ख
भीष्म उवाच:
एकोनविंशे दिवसे यो भुङ्क्ते एकभोजनम् |
८१ क
भीष्म उवाच:
सदा द्वादश मासान्वै सप्त लोकान्स पश्यति ||
८१ ख
भीष्म उवाच:
उत्तमं लभते स्थानमप्सरोगणसेवितम् |
८२ क
भीष्म उवाच:
गन्धर्वैरुपगीतं च विमानं सूर्यवर्चसम् ||
८२ ख
भीष्म उवाच:
तत्रामरवरस्त्रीभिर्मोदते विगतज्वरः |
८३ क
भीष्म उवाच:
दिव्याम्वरधरः श्रीमानय़ुतानां शतं समाः ||
८३ ख
भीष्म उवाच:
पूर्णेऽथ दिवसे विंशे यो भुङ्क्ते ह्येकभोजनम् |
८४ क
भीष्म उवाच:
सदा द्वादश मासांस्तु सत्यवादी धृतव्रतः ||
८४ ख
भीष्म उवाच:
अमांसाशी व्रह्मचारी सर्वभूतहिते रतः |
८५ क
भीष्म उवाच:
स लोकान्विपुलान्दिव्यानादित्यानामुपाश्नुते ||
८५ ख
भीष्म उवाच:
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च दिव्यमाल्यानुलेपनैः |
८६ क
भीष्म उवाच:
विमानैः काञ्चनैर्दिव्यैः पृष्ठतश्चानुगम्यते ||
८६ ख
भीष्म उवाच:
एकविंशे तु दिवसे यो भुङ्क्ते ह्येकभोजनम् |
८७ क
भीष्म उवाच:
सदा द्वादश मासान्वै जुह्वानो जातवेदसम् ||
८७ ख
भीष्म उवाच:
लोकमौशनसं दिव्यं शक्रलोकं च गच्छति |
८८ क
भीष्म उवाच:
अश्विनोर्मरुतां चैव सुखेष्वभिरतः सदा ||
८८ ख
भीष्म उवाच:
अनभिज्ञश्च दुःखानां विमानवरमास्थितः |
८९ क
भीष्म उवाच:
सेव्यमानो वरस्त्रीभिः क्रीडत्यमरवत्प्रभुः ||
८९ ख
भीष्म उवाच:
द्वाविंशे दिवसे प्राप्ते यो भुङ्क्ते ह्येकभोजनम् |
९० क
भीष्म उवाच:
सदा द्वादश मासान्वै जुह्वानो जातवेदसम् ||
९० ख
भीष्म उवाच:
धृतिमानहिंसानिरतः सत्यवागनसूय़कः |
९१ क
भीष्म उवाच:
लोकान्वसूनामाप्नोति दिवाकरसमप्रभः ||
९१ ख
भीष्म उवाच:
कामचारी सुधाहारो विमानवरमास्थितः |
९२ क
भीष्म उवाच:
रमते देवकन्याभिर्दिव्याभरणभूषितः ||
९२ ख
भीष्म उवाच:
त्रय़ोविंशे तु दिवसे प्राशेद्यस्त्वेकभोजनम् |
९३ क
भीष्म उवाच:
सदा द्वादश मासांस्तु मिताहारो जितेन्द्रिय़ः ||
९३ ख
भीष्म उवाच:
वाय़ोरुशनसश्चैव रुद्रलोकं च गच्छति |
९४ क
भीष्म उवाच:
कामचारी कामगमः पूज्यमानोऽप्सरोगणैः ||
९४ ख
भीष्म उवाच:
अनेकगुणपर्यन्तं विमानवरमास्थितः |
९५ क
भीष्म उवाच:
रमते देवकन्याभिर्दिव्याभरणभूषितः ||
९५ ख
भीष्म उवाच:
चतुर्विंशे तु दिवसे यः प्राशेदेकभोजनम् |
९६ क
भीष्म उवाच:
सदा द्वादश मासान्वै जुह्वानो जातवेदसम् ||
९६ ख
भीष्म उवाच:
आदित्यानामधीवासे मोदमानो वसेच्चिरम् |
९७ क
भीष्म उवाच:
दिव्यमाल्याम्वरधरो दिव्यगन्धानुलेपनः ||
९७ ख