भीष्म उवाच:
विमाने काञ्चने दिव्ये हंसय़ुक्ते मनोरमे |
९८ क
भीष्म उवाच:
रमते देवकन्यानां सहस्रैरय़ुतैस्तथा ||
९८ ख
भीष्म उवाच:
पञ्चविंशे तु दिवसे यः प्राशेदेकभोजनम् |
९९ क
भीष्म उवाच:
सदा द्वादश मासांस्तु पुष्कलं यानमारुहेत् ||
९९ ख
भीष्म उवाच:
सिंहव्याघ्रप्रय़ुक्तैश्च मेघस्वननिनादितैः |
१०० क
भीष्म उवाच:
रथैः सनन्दिघोषैश्च पृष्ठतः सोऽनुगम्यते ||
१०० ख
भीष्म उवाच:
देवकन्यासमारूढै राजतैर्विमलैः शुभैः |
१०१ क
भीष्म उवाच:
विमानमुत्तमं दिव्यमास्थाय़ सुमनोहरम् ||
१०१ ख
भीष्म उवाच:
तत्र कल्पसहस्रं वै वसते स्त्रीशतावृते |
१०२ क
भीष्म उवाच:
सुधारसं चोपजीवन्नमृतोपममुत्तमम् ||
१०२ ख
भीष्म उवाच:
षड्विंशे दिवसे यस्तु प्राश्नीय़ादेकभोजनम् |
१०३ क
भीष्म उवाच:
सदा द्वादश मासांस्तु निय़तो निय़ताशनः ||
१०३ ख
भीष्म उवाच:
जितेन्द्रिय़ो वीतरागो जुह्वानो जातवेदसम् |
१०४ क
भीष्म उवाच:
स प्राप्नोति महाभागः पूज्यमानोऽप्सरोगणैः ||
१०४ ख
भीष्म उवाच:
सप्तानां मरुतां लोकान्वसूनां चापि सोऽश्नुते |
१०५ क
भीष्म उवाच:
विमाने स्फाटिके दिव्ये सर्वरत्नैरलङ्कृते ||
१०५ ख
भीष्म उवाच:
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च पूज्यमानः प्रमोदते |
१०६ क
भीष्म उवाच:
द्वे युगानां सहस्रे तु दिव्ये दिव्येन तेजसा ||
१०६ ख
भीष्म उवाच:
सप्तविंशे तु दिवसे यः प्राशेदेकभोजनम् |
१०७ क
भीष्म उवाच:
सदा द्वादश मासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् ||
१०७ ख
भीष्म उवाच:
फलं प्राप्नोति विपुलं देवलोके च पूज्यते |
१०८ क
भीष्म उवाच:
अमृताशी वसंस्तत्र स वितृप्तः प्रमोदते ||
१०८ ख
भीष्म उवाच:
देवर्षिचरितं राजन्राजर्षिभिरधिष्ठितम् |
१०९ क
भीष्म उवाच:
अध्यावसति दिव्यात्मा विमानवरमास्थितः ||
१०९ ख
भीष्म उवाच:
स्त्रीभिर्मनोभिरामाभी रममाणो मदोत्कटः |
११० क
भीष्म उवाच:
युगकल्पसहस्राणि त्रीण्यावसति वै सुखम् ||
११० ख
भीष्म उवाच:
योऽष्टाविंशे तु दिवसे प्राश्नीय़ादेकभोजनम् |
१११ क
भीष्म उवाच:
सदा द्वादश मासांस्तु जितात्मा विजितेन्द्रिय़ः ||
१११ ख
भीष्म उवाच:
फलं देवर्षिचरितं विपुलं समुपाश्नुते |
११२ क
भीष्म उवाच:
भोगवांस्तेजसा भाति सहस्रांशुरिवामलः ||
११२ ख
भीष्म उवाच:
सुकुमार्यश्च नार्यस्तं रममाणाः सुवर्चसः |
११३ क
भीष्म उवाच:
पीनस्तनोरुजघना दिव्याभरणभूषिताः ||
११३ ख
भीष्म उवाच:
रमय़न्ति मनः कान्ता विमाने सूर्यसंनिभे |
११४ क
भीष्म उवाच:
सर्वकामगमे दिव्ये कल्पाय़ुतशतं समाः ||
११४ ख
भीष्म उवाच:
एकोनत्रिंशे दिवसे यः प्राशेदेकभोजनम् |
११५ क
भीष्म उवाच:
सदा द्वादश मासान्वै सत्यव्रतपराय़णः ||
११५ ख
भीष्म उवाच:
तस्य लोकाः शुभा दिव्या देवराजर्षिपूजिताः |
११६ क
भीष्म उवाच:
विमानं चन्द्रशुभ्राभं दिव्यं समधिगच्छति ||
११६ ख
भीष्म उवाच:
जातरूपमय़ं युक्तं सर्वरत्नविभूषितम् |
११७ क
भीष्म उवाच:
अप्सरोगणसम्पूर्णं गन्धर्वैरभिनादितम् ||
११७ ख
भीष्म उवाच:
तत्र चैनं शुभा नार्यो दिव्याभरणभूषिताः |
११८ क
भीष्म उवाच:
मनोभिरामा मधुरा रमय़न्ति मदोत्कटाः ||
११८ ख
भीष्म उवाच:
भोगवांस्तेजसा युक्तो वैश्वानरसमप्रभः |
११९ क
भीष्म उवाच:
दिव्यो दिव्येन वपुषा भ्राजमान इवामरः ||
११९ ख
भीष्म उवाच:
वसूनां मरुतां चैव साध्यानामश्विनोस्तथा |
१२० क
भीष्म उवाच:
रुद्राणां च तथा लोकान्व्रह्मलोकं च गच्छति ||
१२० ख
भीष्म उवाच:
यस्तु मासे गते भुङ्क्ते एकभक्तं शमात्मकः |
१२१ क
भीष्म उवाच:
सदा द्वादश मासान्वै व्रह्मलोकमवाप्नुय़ात् ||
१२१ ख
भीष्म उवाच:
सुधारसकृताहारः श्रीमान्सर्वमनोहरः |
१२२ क
भीष्म उवाच:
तेजसा वपुषा लक्ष्म्या भ्राजते रश्मिवानिव ||
१२२ ख
भीष्म उवाच:
दिव्यमाल्याम्वरधरो दिव्यगन्धानुलेपनः |
१२३ क
भीष्म उवाच:
सुखेष्वभिरतो योगी दुःखानामविजानकः ||
१२३ ख
भीष्म उवाच:
स्वय़म्प्रभाभिर्नारीभिर्विमानस्थो महीय़ते |
१२४ क
भीष्म उवाच:
रुद्रदेवर्षिकन्याभिः सततं चाभिपूज्यते ||
१२४ ख
भीष्म उवाच:
नानाविधसुरूपाभिर्नानारागाभिरेव च |
१२५ क
भीष्म उवाच:
नानामधुरभाषाभिर्नानारतिभिरेव च ||
१२५ ख
भीष्म उवाच:
विमाने नगराकारे सूर्यवत्सूर्यसंनिभे |
१२६ क
भीष्म उवाच:
पृष्ठतः सोमसङ्काशे उदक्चैवाभ्रसंनिभे ||
१२६ ख
भीष्म उवाच:
दक्षिणाय़ां तु रक्ताभे अधस्तान्नीलमण्डले |
१२७ क
भीष्म उवाच:
ऊर्ध्वं चित्राभिसङ्काशे नैको वसति पूजितः ||
१२७ ख
भीष्म उवाच:
यावद्वर्षसहस्रं तु जम्वूद्वीपे प्रवर्षति |
१२८ क
भीष्म उवाच:
तावत्संवत्सराः प्रोक्ता व्रह्मलोकस्य धीमतः ||
१२८ ख
भीष्म उवाच:
विप्रुषश्चैव यावन्त्यो निपतन्ति नभस्तलात् |
१२९ क
भीष्म उवाच:
वर्षासु वर्षतस्तावन्निवसत्यमरप्रभः ||
१२९ ख
भीष्म उवाच:
मासोपवासी वर्षैस्तु दशभिः स्वर्गमुत्तमम् |
१३० क
भीष्म उवाच:
महर्षित्वमथासाद्य सशरीरगतिर्भवेत् ||
१३० ख
भीष्म उवाच:
मुनिर्दान्तो जितक्रोधो जितशिश्नोदरः सदा |
१३१ क
भीष्म उवाच:
जुह्वन्नग्नींश्च निय़तः सन्ध्योपासनसेविता ||
१३१ ख
भीष्म उवाच:
वहुभिर्निय़मैरेवं मासानश्नाति यो नरः |
१३२ क
भीष्म उवाच:
अभ्रावकाशशीलश्च तस्य वासो निरुच्यते ||
१३२ ख
भीष्म उवाच:
दिवं गत्वा शरीरेण स्वेन राजन्यथामरः |
१३३ क
भीष्म उवाच:
स्वर्गं पुण्यं यथाकाममुपभुङ्क्ते यथाविधि ||
१३३ ख
भीष्म उवाच:
एष ते भरतश्रेष्ठ यज्ञानां विधिरुत्तमः |
१३४ क
भीष्म उवाच:
व्याख्यातो ह्यानुपूर्व्येण उपवासफलात्मकः ||
१३४ ख
भीष्म उवाच:
दरिद्रैर्मनुजैः पार्थ प्राप्यं यज्ञफलं यथा |
१३५ क
भीष्म उवाच:
उपवासमिमं कृत्वा गच्छेच्च परमां गतिम् |
१३५ ख
भीष्म उवाच:
देवद्विजातिपूजाय़ां रतो भरतसत्तम ||
१३५ ग
भीष्म उवाच:
उपवासविधिस्त्वेष विस्तरेण प्रकीर्तितः |
१३६ क
भीष्म उवाच:
निय़तेष्वप्रमत्तेषु शौचवत्सु महात्मसु ||
१३६ ख
भीष्म उवाच:
दम्भद्रोहनिवृत्तेषु कृतवुद्धिषु भारत |
१३७ क
भीष्म उवाच:
अचलेष्वप्रकम्पेषु मा ते भूदत्र संशय़ः ||
१३७ ख