chevron_left शान्ति पर्व अध्याय ११३
युधिष्ठिर उवाच:
किं पार्थिवेन कर्तव्यं किं च कृत्वा सुखी भवेत् |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन सर्वं धर्मभृतां वर ||
१ ख
भीष्म उवाच:
हन्त तेऽहं प्रवक्ष्यामि शृणु कार्यैकनिश्चय़म् |
२ क
भीष्म उवाच:
यथा राज्ञेह कर्तव्यं यच्च कृत्वा सुखी भवेत् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
न त्वेवं वर्तितव्यं स्म यथेदमनुशुश्रुमः |
३ क
भीष्म उवाच:
उष्ट्रस्य सुमहद्वृत्तं तन्निवोध युधिष्ठिर ||
३ ख
भीष्म उवाच:
जातिस्मरो महानुष्ट्रः प्राजापत्ययुगोद्भवः |
४ क
भीष्म उवाच:
तपः सुमहदातिष्ठदरण्ये संशितव्रतः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
तपसस्तस्य चान्ते वै प्रीतिमानभवत्प्रभुः |
५ क
भीष्म उवाच:
वरेण छन्दय़ामास ततश्चैनं पितामहः ||
५ ख
उष्ट्र उवाच:
भगवंस्त्वत्प्रसादान्मे दीर्घा ग्रीवा भवेदिय़म् |
६ क
उष्ट्र उवाच:
योजनानां शतं साग्रं या गच्छेच्चरितुं विभो ||
६ ख
भीष्म उवाच:
एवमस्त्विति चोक्तः स वरदेन महात्मना |
७ क
भीष्म उवाच:
प्रतिलभ्य वरं श्रेष्ठं यय़ावुष्ट्रः स्वकं वनम् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
स चकार तदालस्यं वरदानात्स दुर्मतिः |
८ क
भीष्म उवाच:
न चैच्छच्चरितुं गन्तुं दुरात्मा कालमोहितः ||
८ ख
भीष्म उवाच:
स कदाचित्प्रसार्यैवं तां ग्रीवां शतय़ोजनाम् |
९ क
भीष्म उवाच:
चचाराश्रान्तहृदय़ो वातश्चागात्ततो महान् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
स गुहाय़ां शिरोग्रीवं निधाय़ पशुरात्मनः |
१० क
भीष्म उवाच:
आस्ताथ वर्षमभ्यागात्सुमहत्प्लावय़ज्जगत् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
अथ शीतपरीताङ्गो जम्वुकः क्षुच्छ्रमान्वितः |
११ क
भीष्म उवाच:
सदारस्तां गुहामाशु प्रविवेश जलार्दितः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
स दृष्ट्वा मांसजीवी तु सुभृशं क्षुच्छ्रमान्वितः |
१२ क
भीष्म उवाच:
अभक्षय़त्ततो ग्रीवामुष्ट्रस्य भरतर्षभ ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
यदा त्ववुध्यतात्मानं भक्ष्यमाणं स वै पशुः |
१३ क
भीष्म उवाच:
तदा सङ्कोचने यत्नमकरोद्भृशदुःखितः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
यावदूर्ध्वमधश्चैव ग्रीवां सङ्क्षिपते पशुः |
१४ क
भीष्म उवाच:
तावत्तेन सदारेण जम्वुकेन स भक्षितः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
स हत्वा भक्षय़ित्वा च जम्वुकोष्ट्रं ततस्तदा |
१५ क
भीष्म उवाच:
विगते वातवर्षे च निश्चक्राम गुहामुखात् ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
एवं दुर्वुद्धिना प्राप्तमुष्ट्रेण निधनं तदा |
१६ क
भीष्म उवाच:
आलस्यस्य क्रमात्पश्य महद्दोषमुपागतम् ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
त्वमप्येतं विधिं त्यक्त्वा योगेन निय़तेन्द्रिय़ः |
१७ क
भीष्म उवाच:
वर्तस्व वुद्धिमूलं हि विजय़ं मनुरव्रवीत् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
वुद्धिश्रेष्ठानि कर्माणि वाहुमध्यानि भारत |
१८ क
भीष्म उवाच:
तानि जङ्घाजघन्यानि भारप्रत्यवराणि च ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
राज्यं तिष्ठति दक्षस्य सङ्गृहीतेन्द्रिय़स्य च |
१९ क
भीष्म उवाच:
गुप्तमन्त्रश्रुतवतः सुसहाय़स्य चानघ ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
परीक्ष्यकारिणोऽर्थाश्च तिष्ठन्तीह युधिष्ठिर |
२० क
भीष्म उवाच:
सहाय़युक्तेन मही कृत्स्ना शक्या प्रशासितुम् ||
२० ख
भीष्म उवाच:
इदं हि सद्भिः कथितं विधिज्ञैः; पुरा महेन्द्रप्रतिमप्रभाव |
२१ क
भीष्म उवाच:
मय़ापि चोक्तं तव शास्त्रदृष्ट्या; त्वमत्र युक्तः प्रचरस्व राजन् ||
२१ ख