युधिष्ठिर उवाच:
विद्वान्मूर्खप्रगल्भेन मृदुस्तीक्ष्णेन भारत |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
आक्रुश्यमानः सदसि कथं कुर्यादरिन्दम ||
१ ख
भीष्म उवाच:
श्रूय़तां पृथिवीपाल यथैषोऽर्थोऽनुगीय़ते |
२ क
भीष्म उवाच:
सदा सुचेताः सहते नरस्येहाल्पचेतसः ||
२ ख
भीष्म उवाच:
अरुष्यन्क्रुश्यमानस्य सुकृतं नाम विन्दति |
३ क
भीष्म उवाच:
दुष्कृतं चात्मनो मर्षी रुष्यत्येवापमार्ष्टि वै ||
३ ख
भीष्म उवाच:
टिट्टिभं तमुपेक्षेत वाशमानमिवातुरम् |
४ क
भीष्म उवाच:
लोकविद्वेषमापन्नो निष्फलं प्रतिपद्यते ||
४ ख
भीष्म उवाच:
इति स श्लाघते नित्यं तेन पापेन कर्मणा |
५ क
भीष्म उवाच:
इदमुक्तो मय़ा कश्चित्संमतो जनसंसदि |
५ ख
भीष्म उवाच:
स तत्र व्रीडितः शुष्को मृतकल्पोऽवतिष्ठति ||
५ ग
भीष्म उवाच:
श्लाघन्नश्लाघनीय़ेन कर्मणा निरपत्रपः |
६ क
भीष्म उवाच:
उपेक्षितव्यो दान्तेन तादृशः पुरुषाधमः ||
६ ख
भीष्म उवाच:
यद्यद्व्रूय़ादल्पमतिस्तत्तदस्य सहेत्सदा |
७ क
भीष्म उवाच:
प्राकृतो हि प्रशंसन्वा निन्दन्वा किं करिष्यति |
७ ख
भीष्म उवाच:
वने काक इवावुद्धिर्वाशमानो निरर्थकम् ||
७ ग
भीष्म उवाच:
यदि वाग्भिः प्रय़ोगः स्यात्प्रय़ोगे पापकर्मणः |
८ क
भीष्म उवाच:
वागेवार्थो भवेत्तस्य न ह्येवार्थो जिघांसतः ||
८ ख
भीष्म उवाच:
निषेकं विपरीतं स आचष्टे वृत्तचेष्टय़ा |
९ क
भीष्म उवाच:
मय़ूर इव कौपीनं नृत्यन्सन्दर्शय़न्निव ||
९ ख
भीष्म उवाच:
यस्यावाच्यं न लोकेऽस्ति नाकार्यं वापि किञ्चन |
१० क
भीष्म उवाच:
वाचं तेन न सन्दध्याच्छुचिः सङ्क्लिष्टकर्मणा ||
१० ख
भीष्म उवाच:
प्रत्यक्षं गुणवादी यः परोक्षं तु विनिन्दकः |
११ क
भीष्म उवाच:
स मानवः श्ववल्लोके नष्टलोकपराय़णः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
तादृग्जनशतस्यापि यद्ददाति जुहोति च |
१२ क
भीष्म उवाच:
परोक्षेणापवादेन तन्नाशय़ति स क्षणात् ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
तस्मात्प्राज्ञो नरः सद्यस्तादृशं पापचेतसम् |
१३ क
भीष्म उवाच:
वर्जय़ेत्साधुभिर्वर्ज्यं सारमेय़ामिषं यथा ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
परिवादं व्रुवाणो हि दुरात्मा वै महात्मने |
१४ क
भीष्म उवाच:
प्रकाशय़ति दोषान्स्वान्सर्पः फणमिवोच्छ्रितम् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
तं स्वकर्माणि कुर्वाणं प्रतिकर्तुं य इच्छति |
१५ क
भीष्म उवाच:
भस्मकूट इवावुद्धिः खरो रजसि मज्जति ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
मनुष्यशालावृकमप्रशान्तं; जनापवादे सततं निविष्टम् |
१६ क
भीष्म उवाच:
मातङ्गमुन्मत्तमिवोन्नदन्तं; त्यजेत तं श्वानमिवातिरौद्रम् ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
अधीरजुष्टे पथि वर्तमानं; दमादपेतं विनय़ाच्च पापम् |
१७ क
भीष्म उवाच:
अरिव्रतं नित्यमभूतिकामं; धिगस्तु तं पापमतिं मनुष्यम् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
प्रत्युच्यमानस्तु हि भूय़ एभि; र्निशाम्य मा भूस्त्वमथार्तरूपः |
१८ क
भीष्म उवाच:
उच्चस्य नीचेन हि सम्प्रय़ोगं; विगर्हय़न्ति स्थिरवुद्धय़ो ये ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
क्रुद्धो दशार्धेन हि ताडय़ेद्वा; स पांसुभिर्वापकिरेत्तुषैर्वा |
१९ क
भीष्म उवाच:
विवृत्य दन्तांश्च विभीषय़ेद्वा; सिद्धं हि मूर्खे कुपिते नृशंसे ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
विगर्हणां परमदुरात्मना कृतां; सहेत यः संसदि दुर्जनान्नरः |
२० क
भीष्म उवाच:
पठेदिदं चापि निदर्शनं सदा; न वाङ्मय़ं स लभति किञ्चिदप्रिय़म् ||
२० ख