chevron_left अनुशासन पर्व अध्याय ११६
भीष्म उवाच:
वेदोक्तेन प्रमाणेन पितॄणां प्रक्रिय़ासु च |
५० ख
भीष्म उवाच:
अतोऽन्यथा वृथामांसमभक्ष्यं मनुरव्रवीत् ||
५० ग
भीष्म उवाच:
अस्वर्ग्यमय़शस्यं च रक्षोवद्भरतर्षभ |
५१ क
भीष्म उवाच:
विधिना हि नराः पूर्वं मांसं राजन्नभक्षय़न् ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
य इच्छेत्पुरुषोऽत्यन्तमात्मानं निरुपद्रवम् |
५२ क
भीष्म उवाच:
स वर्जय़ेत मांसानि प्राणिनामिह सर्वशः ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
श्रूय़ते हि पुराकल्पे नृणां व्रीहिमय़ः पशुः |
५३ क
भीष्म उवाच:
येनाय़जन्त यज्वानः पुण्यलोकपराय़णाः ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
ऋषिभिः संशय़ं पृष्टो वसुश्चेदिपतिः पुरा |
५४ क
भीष्म उवाच:
अभक्ष्यमिति मांसं स प्राह भक्ष्यमिति प्रभो ||
५४ ख
भीष्म उवाच:
आकाशान्मेदिनीं प्राप्तस्ततः स पृथिवीपतिः |
५५ क
भीष्म उवाच:
एतदेव पुनश्चोक्त्वा विवेश धरणीतलम् ||
५५ ख
भीष्म उवाच:
प्रजानां हितकामेन त्वगस्त्येन महात्मना |
५६ क
भीष्म उवाच:
आरण्याः सर्वदैवत्याः प्रोक्षितास्तपसा मृगाः ||
५६ ख
भीष्म उवाच:
क्रिय़ा ह्येवं न हीय़न्ते पितृदैवतसंश्रिताः |
५७ क
भीष्म उवाच:
प्रीय़न्ते पितरश्चैव न्याय़तो मांसतर्पिताः ||
५७ ख
भीष्म उवाच:
इदं तु शृणु राजेन्द्र कीर्त्यमानं मय़ानघ |
५८ क
भीष्म उवाच:
अभक्षणे सर्वसुखं मांसस्य मनुजाधिप ||
५८ ख
भीष्म उवाच:
यस्तु वर्षशतं पूर्णं तपस्तप्येत्सुदारुणम् |
५९ क
भीष्म उवाच:
यश्चैकं वर्जय़ेन्मांसं सममेतन्मतं मम ||
५९ ख
भीष्म उवाच:
कौमुदे तु विशेषेण शुक्लपक्षे नराधिप |
६० क
भीष्म उवाच:
वर्जय़ेत्सर्वमांसानि धर्मो ह्यत्र विधीय़ते ||
६० ख
भीष्म उवाच:
चतुरो वार्षिकान्मासान्यो मांसं परिवर्जय़ेत् |
६१ क
भीष्म उवाच:
चत्वारि भद्राण्याप्नोति कीर्तिमाय़ुर्यशो वलम् ||
६१ ख
भीष्म उवाच:
अथ वा मासमप्येकं सर्वमांसान्यभक्षय़न् |
६२ क
भीष्म उवाच:
अतीत्य सर्वदुःखानि सुखी जीवेन्निरामय़ः ||
६२ ख
भीष्म उवाच:
ये वर्जय़न्ति मांसानि मासशः पक्षशोऽपि वा |
६३ क
भीष्म उवाच:
तेषां हिंसानिवृत्तानां व्रह्मलोको विधीय़ते ||
६३ ख
भीष्म उवाच:
मांसं तु कौमुदं पक्षं वर्जितं पार्थ राजभिः |
६४ क
भीष्म उवाच:
सर्वभूतात्मभूतैस्तैर्विज्ञातार्थपरावरैः ||
६४ ख
भीष्म उवाच:
नाभागेनाम्वरीषेण गय़ेन च महात्मना |
६५ क
भीष्म उवाच:
आय़ुषा चानरण्येन दिलीपरघुपूरुभिः ||
६५ ख
भीष्म उवाच:
कार्तवीर्यानिरुद्धाभ्यां नहुषेण यय़ातिना |
६६ क
भीष्म उवाच:
नृगेण विष्वगश्वेन तथैव शशविन्दुना |
६६ ख
भीष्म उवाच:
युवनाश्वेन च तथा शिविनौशीनरेण च ||
६६ ग
भीष्म उवाच:
श्येनचित्रेण राजेन्द्र सोमकेन वृकेण च |
६७ क
भीष्म उवाच:
रैवतेन रन्तिदेवेन वसुना सृञ्जय़ेन च ||
६७ ख
भीष्म उवाच:
दुःषन्तेन करूषेण रामालर्कनलैस्तथा |
६८ क
भीष्म उवाच:
विरूपाश्वेन निमिना जनकेन च धीमता ||
६८ ख
भीष्म उवाच:
सिलेन पृथुना चैव वीरसेनेन चैव ह |
६९ क
भीष्म उवाच:
इक्ष्वाकुणा शम्भुना च श्वेतेन सगरेण च ||
६९ ख
भीष्म उवाच:
एतैश्चान्यैश्च राजेन्द्र पुरा मांसं न भक्षितम् |
७० क
भीष्म उवाच:
शारदं कौमुदं मासं ततस्ते स्वर्गमाप्नुवन् ||
७० ख
भीष्म उवाच:
व्रह्मलोके च तिष्ठन्ति ज्वलमानाः श्रिय़ान्विताः |
७१ क
भीष्म उवाच:
उपास्यमाना गन्धर्वैः स्त्रीसहस्रसमन्विताः ||
७१ ख
भीष्म उवाच:
तदेतदुत्तमं धर्ममहिंसालक्षणं शुभम् |
७२ क
भीष्म उवाच:
ये चरन्ति महात्मानो नाकपृष्ठे वसन्ति ते ||
७२ ख
भीष्म उवाच:
मधु मांसं च ये नित्यं वर्जय़न्तीह धार्मिकाः |
७३ क
भीष्म उवाच:
जन्मप्रभृति मद्यं च सर्वे ते मुनय़ः स्मृताः |
७३ ख
भीष्म उवाच:
विशिष्टतां ज्ञातिषु च लभन्ते नात्र संशय़ः ||
७३ ग
भीष्म उवाच:
आपन्नश्चापदो मुच्येद्वद्धो मुच्येत वन्धनात् |
७४ क
भीष्म उवाच:
मुच्येत्तथातुरो रोगाद्दुःखान्मुच्येत दुःखितः ||
७४ ख
भीष्म उवाच:
तिर्यग्योनिं न गच्छेत रूपवांश्च भवेन्नरः |
७५ क
भीष्म उवाच:
वुद्धिमान्वै कुरुश्रेष्ठ प्राप्नुय़ाच्च महद्यशः ||
७५ ख
भीष्म उवाच:
एतत्ते कथितं राजन्मांसस्य परिवर्जने |
७६ क
भीष्म उवाच:
प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च विधानमृषिनिर्मितम् ||
७६ ख