मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः प्रहस्तः सहसा समभ्येत्य विभीषणम् |
१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
गदय़ा ताडय़ामास विनद्य रणकर्कशः ||
१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स तय़ाभिहतो धीमान्गदय़ा भीमवेगय़ा |
२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नाकम्पत महावाहुर्हिमवानिव सुस्थिरः ||
२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः प्रगृह्य विपुलां शतघण्टां विभीषणः |
३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभिमन्त्र्य महाशक्तिं चिक्षेपास्य शिरः प्रति ||
३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पतन्त्या स तय़ा वेगाद्राक्षसोऽशनिनादय़ा |
४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
हृतोत्तमाङ्गो ददृशे वातरुग्ण इव द्रुमः ||
४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तं दृष्ट्वा निहतं सङ्ख्ये प्रहस्तं क्षणदाचरम् |
५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभिदुद्राव धूम्राक्षो वेगेन महता कपीन् ||
५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्य मेघोपमं सैन्यमापतद्भीमदर्शनम् |
६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दृष्ट्वैव सहसा दीर्णा रणे वानरपुङ्गवाः ||
६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्तान्सहसा दीर्णान्दृष्ट्वा वानरपुङ्गवान् |
७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
निर्याय़ कपिशार्दूलो हनूमान्पर्यवस्थितः ||
७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तं दृष्ट्वावस्थितं सङ्ख्ये हरय़ः पवनात्मजम् |
८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वेगेन महता राजन्संन्यवर्तन्त सर्वशः ||
८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः शव्दो महानासीत्तुमुलो लोमहर्षणः |
९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
रामरावणसैन्यानामन्योन्यमभिधावताम् ||
९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्मिन्प्रवृत्ते सङ्ग्रामे घोरे रुधिरकर्दमे |
१० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
धूम्राक्षः कपिसैन्यं तद्द्रावय़ामास पत्रिभिः ||
१० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तं राक्षसमहामात्रमापतन्तं सपत्नजित् |
११ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तरसा प्रतिजग्राह हनूमान्पवनात्मजः ||
११ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तय़ोर्युद्धमभूद्घोरं हरिराक्षसवीरय़ोः |
१२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
जिगीषतोर्युधान्योन्यमिन्द्रप्रह्लादय़ोरिव ||
१२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
गदाभिः परिघैश्चैव राक्षसो जघ्निवान्कपिम् |
१३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कपिश्च जघ्निवान्रक्षः सस्कन्धविटपैर्द्रुमैः ||
१३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्तमतिकाय़ेन साश्वं सरथसारथिम् |
१४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
धूम्राक्षमवधीद्धीमान्हनूमान्मारुतात्मजः ||
१४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्तं निहतं दृष्ट्वा धूम्राक्षं राक्षसोत्तमम् |
१५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
हरय़ो जातविस्रम्भा जघ्नुरभ्येत्य सैनिकान् ||
१५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ते वध्यमाना वलिभिर्हरिभिर्जितकाशिभिः |
१६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
राक्षसा भग्नसङ्कल्पा लङ्कामभ्यपतन्भय़ात् ||
१६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तेऽभिपत्य पुरं भग्ना हतशेषा निशाचराः |
१७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सर्वं राज्ञे यथावृत्तं रावणाय़ न्यवेदय़न् ||
१७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
श्रुत्वा तु रावणस्तेभ्यः प्रहस्तं निहतं युधि |
१८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
धूम्राक्षं च महेष्वासं ससैन्यं वानरर्षभैः ||
१८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुदीर्घमिव निःश्वस्य समुत्पत्य वरासनात् |
१९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उवाच कुम्भकर्णस्य कर्मकालोऽय़मागतः ||
१९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्येवमुक्त्वा विविधैर्वादित्रैः सुमहास्वनैः |
२० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
शय़ानमतिनिद्रालुं कुम्भकर्णमवोधय़त् ||
२० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रवोध्य महता चैनं यत्नेनागतसाध्वसः |
२१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
स्वस्थमासीनमव्यग्रं विनिद्रं राक्षसाधिपः |
२१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततोऽव्रवीद्दशग्रीवः कुम्भकर्णं महावलम् ||
२१ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
धन्योऽसि यस्य ते निद्रा कुम्भकर्णेय़मीदृशी |
२२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
य इमं दारुणं कालं न जानीषे महाभय़म् ||
२२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एष तीर्त्वार्णवं रामः सेतुना हरिभिः सह |
२३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अवमन्येह नः सर्वान्करोति कदनं महत् ||
२३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
मय़ा ह्यपहृता भार्या सीता नामास्य जानकी |
२४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तां मोक्षय़िषुराय़ातो वद्ध्वा सेतुं महार्णवे ||
२४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तेन चैव प्रहस्तादिर्महान्नः स्वजनो हतः |
२५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्य नान्यो निहन्तास्ति त्वदृते शत्रुकर्शन ||
२५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स दंशितोऽभिनिर्याय़ त्वमद्य वलिनां वर |
२६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
रामादीन्समरे सर्वाञ्जहि शत्रूनरिन्दम ||
२६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दूषणावरजौ चैव वज्रवेगप्रमाथिनौ |
२७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तौ त्वां वलेन महता सहितावनुय़ास्यतः ||
२७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्युक्त्वा राक्षसपतिः कुम्भकर्णं तरस्विनम् |
२८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सन्दिदेशेतिकर्तव्ये वज्रवेगप्रमाथिनौ ||
२८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तथेत्युक्त्वा तु तौ वीरौ रावणं दूषणानुजौ |
२९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कुम्भकर्णं पुरस्कृत्य तूर्णं निर्ययतुः पुरात् ||
२९ ख