chevron_left शान्ति पर्व अध्याय ११८
भीष्म उवाच:
स श्वा प्रकृतिमापन्नः परं दैन्यमुपागमत् |
१ क
भीष्म उवाच:
ऋषिणा हुङ्कृतः पापस्तपोवनवहिष्कृतः ||
१ ख
भीष्म उवाच:
एवं राज्ञा मतिमता विदित्वा शीलशौचताम् |
२ क
भीष्म उवाच:
आर्जवं प्रकृतिं सत्त्वं कुलं वृत्तं श्रुतं दमम् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
अनुक्रोशं वलं वीर्यं भावं सम्प्रशमं क्षमाम् |
३ क
भीष्म उवाच:
भृत्या ये यत्र योग्याः स्युस्तत्र स्थाप्याः सुशिक्षिताः ||
३ ख
भीष्म उवाच:
नापरीक्ष्य महीपालः प्रकर्तुं भृत्यमर्हति |
४ क
भीष्म उवाच:
अकुलीननराकीर्णो न राजा सुखमेधते ||
४ ख
भीष्म उवाच:
कुलजः प्रकृतो राज्ञा तत्कुलीनतय़ा सदा |
५ क
भीष्म उवाच:
न पापे कुरुते वुद्धिं निन्द्यमानोऽप्यनागसि ||
५ ख
भीष्म उवाच:
अकुलीनस्तु पुरुषः प्रकृतः साधुसङ्क्षय़ात् |
६ क
भीष्म उवाच:
दुर्लभैश्वर्यतां प्राप्तो निन्दितः शत्रुतां व्रजेत् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
कुलीनं शिक्षितं प्राज्ञं ज्ञानविज्ञानकोविदम् |
७ क
भीष्म उवाच:
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञं सहिष्णुं देशजं तथा ||
७ ख
भीष्म उवाच:
कृतज्ञं वलवन्तं च क्षान्तं दान्तं जितेन्द्रिय़म् |
८ क
भीष्म उवाच:
अलुव्धं लव्धसन्तुष्टं स्वामिमित्रवुभूषकम् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
सचिवं देशकालज्ञं सर्वसङ्ग्रहणे रतम् |
९ क
भीष्म उवाच:
सत्कृतं युक्तमनसं हितैषिणमतन्द्रितम् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
युक्ताचारं स्वविषय़े सन्धिविग्रहकोविदम् |
१० क
भीष्म उवाच:
राज्ञस्त्रिवर्गवेत्तारं पौरजानपदप्रिय़म् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
खातकव्यूहतत्त्वज्ञं वलहर्षणकोविदम् |
११ क
भीष्म उवाच:
इङ्गिताकारतत्त्वज्ञं यात्राय़ानविशारदम् ||
११ ख
भीष्म उवाच:
हस्तिशिक्षासु तत्त्वज्ञमहङ्कारविवर्जितम् |
१२ क
भीष्म उवाच:
प्रगल्भं दक्षिणं दान्तं वलिनं युक्तकारिणम् ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
चोक्षं चोक्षजनाकीर्णं सुवेषं सुखदर्शनम् |
१३ क
भीष्म उवाच:
नाय़कं नीतिकुशलं गुणषष्ट्या समन्वितम् ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
अस्तव्धं प्रश्रितं शक्तं मृदुवादिनमेव च |
१४ क
भीष्म उवाच:
धीरं श्लक्ष्णं महर्द्धिं च देशकालोपपादकम् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
सचिवं यः प्रकुरुते न चैनमवमन्यते |
१५ क
भीष्म उवाच:
तस्य विस्तीर्यते राज्यं ज्योत्स्ना ग्रहपतेरिव ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
एतैरेव गुणैर्युक्तो राजा शास्त्रविशारदः |
१६ क
भीष्म उवाच:
एष्टव्यो धर्मपरमः प्रजापालनतत्परः ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
धीरो मर्षी शुचिः शीघ्रः काले पुरुषकारवित् |
१७ क
भीष्म उवाच:
शुश्रूषुः श्रुतवाञ्श्रोता ऊहापोहविशारदः ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
मेधावी धारणाय़ुक्तो यथान्याय़ोपपादकः |
१८ क
भीष्म उवाच:
दान्तः सदा प्रिय़ाभाषी क्षमावांश्च विपर्यये ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
दानाच्छेदे स्वय़ङ्कारी सुद्वारः सुखदर्शनः |
१९ क
भीष्म उवाच:
आर्तहस्तप्रदो नित्यमाप्तंमन्यो नय़े रतः ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
नाहंवादी न निर्द्वन्द्वो न यत्किञ्चनकारकः |
२० क
भीष्म उवाच:
कृते कर्मण्यमोघानां कर्ता भृत्यजनप्रिय़ः ||
२० ख
भीष्म उवाच:
सङ्गृहीतजनोऽस्तव्धः प्रसन्नवदनः सदा |
२१ क
भीष्म उवाच:
दाता भृत्यजनावेक्षी न क्रोधी सुमहामनाः ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
युक्तदण्डो न निर्दण्डो धर्मकार्यानुशासकः |
२२ क
भीष्म उवाच:
चारनेत्रः परावेक्षी धर्मार्थकुशलः सदा ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
राजा गुणशताकीर्ण एष्टव्यस्तादृशो भवेत् |
२३ क
भीष्म उवाच:
योधाश्चैव मनुष्येन्द्र सर्वैर्गुणगुणैर्वृताः ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
अन्वेष्टव्याः सुपुरुषाः सहाय़ा राज्यधारणाः |
२४ क
भीष्म उवाच:
न विमानय़ितव्याश्च राज्ञा वृद्धिमभीप्सता ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
योधाः समरशौटीराः कृतज्ञाः शस्त्रकोविदाः |
२५ क
भीष्म उवाच:
धर्मशास्त्रसमाय़ुक्ताः पदातिजनसंय़ुताः ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
अर्थमानविवृद्धाश्च रथचर्याविशारदाः |
२६ क
भीष्म उवाच:
इष्वस्त्रकुशला यस्य तस्येय़ं नृपतेर्मही ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
सर्वसङ्ग्रहणे युक्तो नृपो भवति यः सदा |
२७ क
भीष्म उवाच:
उत्थानशीलो मित्राढ्यः स राजा राजसत्तमः ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
शक्या अश्वसहस्रेण वीरारोहेण भारत |
२८ क
भीष्म उवाच:
सङ्गृहीतमनुष्येण कृत्स्ना जेतुं वसुन्धरा ||
२८ ख