chevron_left वन पर्व अध्याय १२
विदुर उवाच:
तद्वृक्षय़ुद्धमभवत्सुमुहूर्तं विशां पते |
५० क
विदुर उवाच:
राक्षसानां च मुख्यस्य नराणामुत्तमस्य च ||
५० ख
विदुर उवाच:
ततः शिलां समुत्क्षिप्य भीमस्य युधि तिष्ठतः |
५१ क
विदुर उवाच:
प्राहिणोद्राक्षसः क्रुद्धो भीमसेनश्चचाल ह ||
५१ ख
विदुर उवाच:
तं शिलाताडनजडं पर्यधावत्स राक्षसः |
५२ क
विदुर उवाच:
वाहुविक्षिप्तकिरणः स्वर्भानुरिव भास्करम् ||
५२ ख
विदुर उवाच:
तावन्योन्यं समाश्लिष्य प्रकर्षन्तौ परस्परम् |
५३ क
विदुर उवाच:
उभावपि चकाशेते प्रय़ुद्धौ वृषभाविव ||
५३ ख
विदुर उवाच:
तय़ोरासीत्सुतुमुलः सम्प्रहारः सुदारुणः |
५४ क
विदुर उवाच:
नखदंष्ट्राय़ुधवतोर्व्याघ्रय़ोरिव दृप्तय़ोः ||
५४ ख
विदुर उवाच:
दुर्योधननिकाराच्च वाहुवीर्याच्च दर्पितः |
५५ क
विदुर उवाच:
कृष्णानय़नदृष्टश्च व्यवर्धत वृकोदरः ||
५५ ख
विदुर उवाच:
अभिपत्याथ वाहुभ्यां प्रत्यगृह्णादमर्षितः |
५६ क
विदुर उवाच:
मातङ्ग इव मातङ्गं प्रभिन्नकरटामुखः ||
५६ ख
विदुर उवाच:
तं चाप्याथ ततो रक्षः प्रतिजग्राह वीर्यवान् |
५७ क
विदुर उवाच:
तमाक्षिपद्भीमसेनो वलेन वलिनां वरः ||
५७ ख
विदुर उवाच:
तय़ोर्भुजविनिष्पेषादुभय़ोर्वलिनोस्तदा |
५८ क
विदुर उवाच:
शव्दः समभवद्घोरो वेणुस्फोटसमो युधि ||
५८ ख
विदुर उवाच:
अथैनमाक्षिप्य वलाद्गृह्य मध्ये वृकोदरः |
५९ क
विदुर उवाच:
धूनय़ामास वेगेन वाय़ुश्चण्ड इव द्रुमम् ||
५९ ख
विदुर उवाच:
स भीमेन परामृष्टो दुर्वलो वलिना रणे |
६० क
विदुर उवाच:
व्यस्पन्दत यथाप्राणं विचकर्ष च पाण्डवम् ||
६० ख
विदुर उवाच:
तत एनं परिश्रान्तमुपलभ्य वृकोदरः |
६१ क
विदुर उवाच:
योक्त्रय़ामास वाहुभ्यां पशुं रशनय़ा यथा ||
६१ ख
विदुर उवाच:
विनदन्तं महानादं भिन्नभेरीसमस्वनम् |
६२ क
विदुर उवाच:
भ्रामय़ामास सुचिरं विस्फुरन्तमचेतसम् ||
६२ ख
विदुर उवाच:
तं विषीदन्तमाज्ञाय़ राक्षसं पाण्डुनन्दनः |
६३ क
विदुर उवाच:
प्रगृह्य तरसा दोर्भ्यां पशुमारममारय़त् ||
६३ ख
विदुर उवाच:
आक्रम्य स कटीदेशे जानुना राक्षसाधमम् |
६४ क
विदुर उवाच:
अपीडय़त वाहुभ्यां कण्ठं तस्य वृकोदरः ||
६४ ख
विदुर उवाच:
अथ तं जडसर्वाङ्गं व्यावृत्तनय़नोल्वणम् |
६५ क
विदुर उवाच:
भूतले पातय़ामास वाक्यं चेदमुवाच ह ||
६५ ख
विदुर उवाच:
हिडिम्ववकय़ोः पाप न त्वमश्रुप्रमार्जनम् |
६६ क
विदुर उवाच:
करिष्यसि गतश्चासि यमस्य सदनं प्रति ||
६६ ख
विदुर उवाच:
इत्येवमुक्त्वा पुरुषप्रवीर; स्तं राक्षसं क्रोधविवृत्तनेत्रः |
६७ क
विदुर उवाच:
प्रस्रस्तवस्त्राभरणं स्फुरन्त; मुद्भ्रान्तचित्तं व्यसुमुत्ससर्ज ||
६७ ख
विदुर उवाच:
तस्मिन्हते तोय़दतुल्यरूपे; कृष्णां पुरस्कृत्य नरेन्द्रपुत्राः |
६८ क
विदुर उवाच:
भीमं प्रशस्याथ गुणैरनेकै; र्हृष्टास्ततो द्वैतवनाय़ जग्मुः ||
६८ ख
विदुर उवाच:
एवं विनिहतः सङ्ख्ये किर्मीरो मनुजाधिप |
६९ क
विदुर उवाच:
भीमेन वचनात्तस्य धर्मराजस्य कौरव ||
६९ ख
विदुर उवाच:
ततो निष्कण्टकं कृत्वा वनं तदपराजितः |
७० क
विदुर उवाच:
द्रौपद्या सह धर्मज्ञो वसतिं तामुवास ह ||
७० ख
विदुर उवाच:
समाश्वास्य च ते सर्वे द्रौपदीं भरतर्षभाः |
७१ क
विदुर उवाच:
प्रहृष्टमनसः प्रीत्या प्रशशंसुर्वृकोदरम् ||
७१ ख
विदुर उवाच:
भीमवाहुवलोत्पिष्टे विनष्टे राक्षसे ततः |
७२ क
विदुर उवाच:
विविशुस्तद्वनं वीराः क्षेमं निहतकण्टकम् ||
७२ ख
विदुर उवाच:
स मय़ा गच्छता मार्गे विनिकीर्णो भय़ावहः |
७३ क
विदुर उवाच:
वने महति दुष्टात्मा दृष्टो भीमवलाद्धतः ||
७३ ख
विदुर उवाच:
तत्राश्रौषमहं चैतत्कर्म भीमस्य भारत |
७४ क
विदुर उवाच:
व्राह्मणानां कथय़तां ये तत्रासन्समागताः ||
७४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
एवं विनिहतं सङ्ख्ये किर्मीरं राक्षसोत्तमम् |
७५ क
वैशम्पाय़न उवाच:
श्रुत्वा ध्यानपरो राजा निशश्वासार्तवत्तदा ||
७५ ख