chevron_left आश्रमवासिक पर्व अध्याय १२
धृतराष्ट्र उवाच:
सन्धिविग्रहमप्यत्र पश्येथा राजसत्तम |
१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
द्विय़ोनिं त्रिविधोपाय़ं वहुकल्पं युधिष्ठिर ||
१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
राजेन्द्र पर्युपासीथाश्छित्त्वा द्वैविध्यमात्मनः |
२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तुष्टपुष्टवलः शत्रुरात्मवानिति च स्मरेत् ||
२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
पर्युपासनकाले तु विपरीतं विधीय़ते |
३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
आमर्दकाले राजेन्द्र व्यपसर्पस्ततो वरः ||
३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
व्यसनं भेदनं चैव शत्रूणां कारय़ेत्ततः |
४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कर्शनं भीषणं चैव युद्धे चापि वहुक्षय़म् ||
४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रय़ास्यमानो नृपतिस्त्रिविधं परिचिन्तय़ेत् |
५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
आत्मनश्चैव शत्रोश्च शक्तिं शास्त्रविशारदः ||
५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
उत्साहप्रभुशक्तिभ्यां मन्त्रशक्त्या च भारत |
६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
उपपन्नो नरो याय़ाद्विपरीतमतोऽन्यथा ||
६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आददीत वलं राजा मौलं मित्रवलं तथा |
७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अटवीवलं भृतं चैव तथा श्रेणीवलं च यत् ||
७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तत्र मित्रवलं राजन्मौलेन न विशिष्यते |
८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
श्रेणीवलं भृतं चैव तुल्य एवेति मे मतिः ||
८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तथा चारवलं चैव परस्परसमं नृप |
९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
विज्ञेय़ं वलकालेषु राज्ञा काल उपस्थिते ||
९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आपदश्चापि वोद्धव्या वहुरूपा नराधिप |
१० क
धृतराष्ट्र उवाच:
भवन्ति राज्ञां कौरव्य यास्ताः पृथगतः शृणु ||
१० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
विकल्पा वहवो राजन्नापदां पाण्डुनन्दन |
११ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सामादिभिरुपन्यस्य शमय़ेत्तान्नृपः सदा ||
११ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यात्रां याय़ाद्वलैर्युक्तो राजा षड्भिः परन्तप |
१२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
संय़ुक्तो देशकालाभ्यां वलैरात्मगुणैस्तथा ||
१२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तुष्टपुष्टवलो याय़ाद्राजा वृद्ध्युदय़े रतः |
१३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
आहूतश्चाप्यथो याय़ादनृतावपि पार्थिवः ||
१३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
स्थूणाश्मानं वाजिरथप्रधानां; ध्वजद्रुमैः संवृतकूलरोधसम् |
१४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पदातिनागैर्वहुकर्दमां नदीं; सपत्ननाशे नृपतिः प्रय़ाय़ात् ||
१४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अथोपपत्त्या शकटं पद्मं वज्रं च भारत |
१५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
उशना वेद यच्छास्त्रं तत्रैतद्विहितं विभो ||
१५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सादय़ित्वा परवलं कृत्वा च वलहर्षणम् |
१६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
स्वभूमौ योजय़ेद्युद्धं परभूमौ तथैव च ||
१६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
लव्धं प्रशमय़ेद्राजा निक्षिपेद्धनिनो नरान् |
१७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
ज्ञात्वा स्वविषय़ं तं च सामादिभिरुपक्रमेत् ||
१७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सर्वथैव महाराज शरीरं धारय़ेदिह |
१८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रेत्येह चैव कर्तव्यमात्मनिःश्रेय़सं परम् ||
१८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एवं कुर्वञ्शुभा वाचो लोकेऽस्मिञ्शृणुते नृपः |
१९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रेत्य स्वर्गं तथाप्नोति प्रजा धर्मेण पालय़न् ||
१९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एवं त्वय़ा कुरुश्रेष्ठ वर्तितव्यं प्रजाहितम् |
२० क
धृतराष्ट्र उवाच:
उभय़ोर्लोकय़ोस्तात प्राप्तय़े नित्यमेव च ||
२० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
भीष्मेण पूर्वमुक्तोऽसि कृष्णेन विदुरेण च |
२१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
मय़ाप्यवश्यं वक्तव्यं प्रीत्या ते नृपसत्तम ||
२१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एतत्सर्वं यथान्याय़ं कुर्वीथा भूरिदक्षिण |
२२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रिय़स्तथा प्रजानां त्वं स्वर्गे सुखमवाप्स्यसि ||
२२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अश्वमेधसहस्रेण यो यजेत्पृथिवीपतिः |
२३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पालय़ेद्वापि धर्मेण प्रजास्तुल्यं फलं लभेत् ||
२३ ख