धृतराष्ट्र उवाच:
किर्मीरस्य वधं क्षत्तः श्रोतुमिच्छामि कथ्यताम् |
१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
रक्षसा भीमसेनस्य कथमासीत्समागमः ||
१ ख
विदुर उवाच:
शृणु भीमस्य कर्मेदमतिमानुषकर्मणः |
२ क
विदुर उवाच:
श्रुतपूर्वं मय़ा तेषां कथान्तेषु पुनः पुनः ||
२ ख
विदुर उवाच:
इतः प्रय़ाता राजेन्द्र पाण्डवा द्यूतनिर्जिताः |
३ क
विदुर उवाच:
जग्मुस्त्रिभिरहोरात्रैः काम्यकं नाम तद्वनम् ||
३ ख
विदुर उवाच:
रात्रौ निशीथे स्वाभीले गतेऽर्धसमय़े नृप |
४ क
विदुर उवाच:
प्रचारे पुरुषादानां रक्षसां भीमकर्मणाम् ||
४ ख
विदुर उवाच:
तद्वनं तापसा नित्यं शेषाश्च वनचारिणः |
५ क
विदुर उवाच:
दूरात्परिहरन्ति स्म पुरुषादभय़ात्किल ||
५ ख
विदुर उवाच:
तेषां प्रविशतां तत्र मार्गमावृत्य भारत |
६ क
विदुर उवाच:
दीप्ताक्षं भीषणं रक्षः सोल्मुकं प्रत्यदृश्यत ||
६ ख
विदुर उवाच:
वाहू महान्तौ कृत्वा तु तथास्यं च भय़ानकम् |
७ क
विदुर उवाच:
स्थितमावृत्य पन्थानं येन यान्ति कुरूद्वहाः ||
७ ख
विदुर उवाच:
दष्टोष्ठदंष्ट्रं ताम्राक्षं प्रदीप्तोर्ध्वशिरोरुहम् |
८ क
विदुर उवाच:
सार्करश्मितडिच्चक्रं सवलाकमिवाम्वुदम् ||
८ ख
विदुर उवाच:
सृजन्तं राक्षसीं माय़ां महारावविराविणम् |
९ क
विदुर उवाच:
मुञ्चन्तं विपुलं नादं सतोय़मिव तोय़दम् ||
९ ख
विदुर उवाच:
तस्य नादेन सन्त्रस्ताः पक्षिणः सर्वतोदिशम् |
१० क
विदुर उवाच:
विमुक्तनादाः सम्पेतुः स्थलजा जलजैः सह ||
१० ख
विदुर उवाच:
सम्प्रद्रुतमृगद्वीपिमहिषर्क्षसमाकुलम् |
११ क
विदुर उवाच:
तद्वनं तस्य नादेन सम्प्रस्थितमिवाभवत् ||
११ ख
विदुर उवाच:
तस्योरुवाताभिहता ताम्रपल्लववाहवः |
१२ क
विदुर उवाच:
विदूरजाताश्च लताः समाश्लिष्यन्त पादपान् ||
१२ ख
विदुर उवाच:
तस्मिन्क्षणेऽथ प्रववौ मारुतो भृशदारुणः |
१३ क
विदुर उवाच:
रजसा संवृतं तेन नष्टर्ष्कमभवन्नभः ||
१३ ख
विदुर उवाच:
पञ्चानां पाण्डुपुत्राणामविज्ञातो महारिपुः |
१४ क
विदुर उवाच:
पञ्चानामिन्द्रिय़ाणां तु शोकवेग इवातुलः ||
१४ ख
विदुर उवाच:
स दृष्ट्वा पाण्डवान्दूरात्कृष्णाजिनसमावृतान् |
१५ क
विदुर उवाच:
आवृणोत्तद्वनद्वारं मैनाक इव पर्वतः ||
१५ ख
विदुर उवाच:
तं समासाद्य वित्रस्ता कृष्णा कमललोचना |
१६ क
विदुर उवाच:
अदृष्टपूर्वं सन्त्रासान्न्यमीलय़त लोचने ||
१६ ख
विदुर उवाच:
दुःशासनकरोत्सृष्टविप्रकीर्णशिरोरुहा |
१७ क
विदुर उवाच:
पञ्चपर्वतमध्यस्था नदीवाकुलतां गता ||
१७ ख
विदुर उवाच:
मोमुह्यमानां तां तत्र जगृहुः पञ्च पाण्डवाः |
१८ क
विदुर उवाच:
इन्द्रिय़ाणि प्रसक्तानि विषय़ेषु यथा रतिम् ||
१८ ख
विदुर उवाच:
अथ तां राक्षसीं माय़ामुत्थितां घोरदर्शनाम् |
१९ क
विदुर उवाच:
रक्षोघ्नैर्विविधैर्मन्त्रैर्धौम्यः सम्यक्प्रय़ोजितैः |
१९ ख
विदुर उवाच:
पश्यतां पाण्डुपुत्राणां नाशय़ामास वीर्यवान् ||
१९ ग
विदुर उवाच:
स नष्टमाय़ोऽतिवलः क्रोधविस्फारितेक्षणः |
२० क
विदुर उवाच:
काममूर्तिधरः क्षुद्रः कालकल्पो व्यदृश्यत ||
२० ख
विदुर उवाच:
तमुवाच ततो राजा दीर्घप्रज्ञो युधिष्ठिरः |
२१ क
विदुर उवाच:
को भवान्कस्य वा किं ते क्रिय़तां कार्यमुच्यताम् ||
२१ ख
विदुर उवाच:
प्रत्युवाचाथ तद्रक्षो धर्मराजं युधिष्ठिरम् |
२२ क
विदुर उवाच:
अहं वकस्य वै भ्राता किर्मीर इति विश्रुतः ||
२२ ख
विदुर उवाच:
वनेऽस्मिन्काम्यके शून्ये निवसामि गतज्वरः |
२३ क
विदुर उवाच:
युधि निर्जित्य पुरुषानाहारं नित्यमाचरन् ||
२३ ख
विदुर उवाच:
के यूय़मिह सम्प्राप्ता भक्ष्यभूता ममान्तिकम् |
२४ क
विदुर उवाच:
युधि निर्जित्य वः सर्वान्भक्षय़िष्ये गतज्वरः ||
२४ ख
विदुर उवाच:
युधिष्ठिरस्तु तच्छ्रुत्वा वचस्तस्य दुरात्मनः |
२५ क
विदुर उवाच:
आचचक्षे ततः सर्वं गोत्रनामादि भारत ||
२५ ख
विदुर उवाच:
पाण्डवो धर्मराजोऽहं यदि ते श्रोत्रमागतः |
२६ क
विदुर उवाच:
सहितो भ्रातृभिः सर्वैर्भीमसेनार्जुनादिभिः ||
२६ ख
विदुर उवाच:
हृतराज्यो वने वासं वस्तुं कृतमतिस्ततः |
२७ क
विदुर उवाच:
वनमभ्यागतो घोरमिदं तव परिग्रहम् ||
२७ ख
विदुर उवाच:
किर्मीरस्त्वव्रवीदेनं दिष्ट्या देवैरिदं मम |
२८ क
विदुर उवाच:
उपपादितमद्येह चिरकालान्मनोगतम् ||
२८ ख
विदुर उवाच:
भीमसेनवधार्थं हि नित्यमभ्युद्यताय़ुधः |
२९ क
विदुर उवाच:
चरामि पृथिवीं कृत्स्नां नैनमासादय़ाम्यहम् ||
२९ ख
विदुर उवाच:
सोऽय़मासादितो दिष्ट्या भ्रातृहा काङ्क्षितश्चिरम् |
३० क
विदुर उवाच:
अनेन हि मम भ्राता वको विनिहतः प्रिय़ः ||
३० ख
विदुर उवाच:
वेत्रकीय़गृहे राजन्व्राह्मणच्छद्मरूपिणा |
३१ क
विदुर उवाच:
विद्यावलमुपाश्रित्य न ह्यस्त्यस्यौरसं वलम् ||
३१ ख
विदुर उवाच:
हिडिम्वश्च सखा मह्यं दय़ितो वनगोचरः |
३२ क
विदुर उवाच:
हतो दुरात्मनानेन स्वसा चास्य हृता पुरा ||
३२ ख
विदुर उवाच:
सोऽय़मभ्यागतो मूढो ममेदं गहनं वनम् |
३३ क
विदुर उवाच:
प्रचारसमय़ेऽस्माकमर्धरात्रे समास्थिते ||
३३ ख
विदुर उवाच:
अद्यास्य यातय़िष्यामि तद्वैरं चिरसम्भृतम् |
३४ क
विदुर उवाच:
तर्पय़िष्यामि च वकं रुधिरेणास्य भूरिणा ||
३४ ख
विदुर उवाच:
अद्याहमनृणो भूत्वा भ्रातुः सख्युस्तथैव च |
३५ क
विदुर उवाच:
शान्तिं लव्धास्मि परमां हत्व राक्षसकण्टकम् ||
३५ ख
विदुर उवाच:
यदि तेन पुरा मुक्तो भीमसेनो वकेन वै |
३६ क
विदुर उवाच:
अद्यैनं भक्षय़िष्यामि पश्यतस्ते युधिष्ठिर ||
३६ ख
विदुर उवाच:
एनं हि विपुलप्राणमद्य हत्वा वृकोदरम् |
३७ क
विदुर उवाच:
सम्भक्ष्य जरय़िष्यामि यथागस्त्यो महासुरम् ||
३७ ख
विदुर उवाच:
एवमुक्तस्तु धर्मात्मा सत्यसन्धो युधिष्ठिरः |
३८ क
विदुर उवाच:
नैतदस्तीति सक्रोधो भर्त्सय़ामास राक्षसम् ||
३८ ख
विदुर उवाच:
ततो भीमो महावाहुरारुज्य तरसा द्रुम |
३९ क
विदुर उवाच:
दशव्याममिवोद्विद्धं निष्पत्रमकरोत्तदा ||
३९ ख
विदुर उवाच:
चकार सज्यं गाण्डीवं वज्रनिष्पेषगौरवम् |
४० क
विदुर उवाच:
निमेषान्तरमात्रेण तथैव विजय़ोऽर्जुनः ||
४० ख
विदुर उवाच:
निवार्य भीमो जिष्णुं तु तद्रक्षो घोरदर्शनम् |
४१ क
विदुर उवाच:
अभिद्रुत्याव्रवीद्वाक्यं तिष्ठ तिष्ठेति भारत ||
४१ ख
विदुर उवाच:
इत्युक्त्वैनमभिक्रुद्धः कक्ष्यामुत्पीड्य पाण्डवः |
४२ क
विदुर उवाच:
निष्पिष्य पाणिना पाणिं सन्दष्टोष्ठपुटो वली |
४२ ख
विदुर उवाच:
तमभ्यधावद्वेगेन भीमो वृक्षाय़ुधस्तदा ||
४२ ग
विदुर उवाच:
यमदण्डप्रतीकाशं ततस्तं तस्य मूर्धनि |
४३ क
विदुर उवाच:
पातय़ामास वेगेन कुलिशं मघवानिव ||
४३ ख
विदुर उवाच:
असम्भ्रान्तं तु तद्रक्षः समरे प्रत्यदृश्यत |
४४ क
विदुर उवाच:
चिक्षेप चोल्मुकं दीप्तमशनिं ज्वलितामिव ||
४४ ख
विदुर उवाच:
तदुदस्तमलातं तु भीमः प्रहरतां वरः |
४५ क
विदुर उवाच:
पदा सव्येन चिक्षेप तद्रक्षः पुनराव्रजत् ||
४५ ख
विदुर उवाच:
किर्मीरश्चापि सहसा वृक्षमुत्पाट्य पाण्डवम् |
४६ क
विदुर उवाच:
दण्डपाणिरिव क्रुद्धः समरे प्रत्ययुध्यत ||
४६ ख
विदुर उवाच:
तद्वृक्षय़ुद्धमभवन्महीरुहविनाशनम् |
४७ क
विदुर उवाच:
वालिसुग्रीवय़ोर्भ्रात्रोर्यथा श्रीकाङ्क्षिणोः पुरा ||
४७ ख
विदुर उवाच:
शीर्षय़ोः पतिता वृक्षा विभिदुर्नैकधा तय़ोः |
४८ क
विदुर उवाच:
यथैवोत्पलपद्मानि मत्तय़ोर्द्विपय़ोस्तथा ||
४८ ख
विदुर उवाच:
मुञ्जवज्जर्जरीभूता वहवस्तत्र पादपाः |
४९ क
विदुर उवाच:
चीराणीव व्युदस्तानि रेजुस्तत्र महावने ||
४९ ख