chevron_left शान्ति पर्व अध्याय १२०
भीष्म उवाच:
धर्मान्वितेषु विज्ञातो मन्त्री गुप्तश्च पाण्डव |
४८ क
भीष्म उवाच:
आप्तो राजन्कुलीनश्च पर्याप्तो राज्यसङ्ग्रहे ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
विधिप्रवृत्तान्नरदेवधर्मा; नुक्तान्समासेन निवोध वुद्ध्या |
४९ क
भीष्म उवाच:
इमान्विदध्याद्व्यनुसृत्य यो वै; राजा महीं पालय़ितुं स शक्तः ||
४९ ख
भीष्म उवाच:
अनीतिजं यद्यविधानजं सुखं; हठप्रणीतं विविधं प्रदृश्यते |
५० क
भीष्म उवाच:
न विद्यते तस्य गतिर्महीपते; र्न विद्यते राष्ट्रजमुत्तमं सुखम् ||
५० ख
भीष्म उवाच:
धनैर्विशिष्टान्मतिशीलपूजिता; न्गुणोपपन्नान्युधि दृष्टविक्रमान् |
५१ क
भीष्म उवाच:
गुणेषु दृष्टानचिरादिहात्मवा; न्सतोऽभिसन्धाय़ निहन्ति शात्रवान् ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
पश्येदुपाय़ान्विविधैः क्रिय़ापथै; र्न चानुपाय़ेन मतिं निवेशय़ेत् |
५२ क
भीष्म उवाच:
श्रिय़ं विशिष्टां विपुलं यशो धनं; न दोषदर्शी पुरुषः समश्नुते ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
प्रीतिप्रवृत्तौ विनिवर्तने तथा; सुहृत्सु विज्ञाय़ निवृत्य चोभय़ोः |
५३ क
भीष्म उवाच:
यदेव मित्रं गुरुभारमावहे; त्तदेव सुस्निग्धमुदाहरेद्वुधः ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
एतान्मय़ोक्तांस्तव राजधर्मा; न्नृणां च गुप्तौ मतिमादधत्स्व |
५४ क
भीष्म उवाच:
अवाप्स्यसे पुण्यफलं सुखेन; सर्वो हि लोकोत्तमधर्ममूलः ||
५४ ख