भीष्म उवाच:
तस्माद्यः सहितो दृष्टो भर्तृप्रत्ययलक्षणः ||
४८ ग
भीष्म उवाच:
व्यवहारस्तु वेदात्मा वेदप्रत्यय उच्यते |
४९ क
भीष्म उवाच:
मौलश्च नरशार्दूल शास्त्रोक्तश्च तथापरः ||
४९ ख
भीष्म उवाच:
उक्तो यश्चापि दण्डोऽसौ भर्तृप्रत्ययलक्षणः |
५० क
भीष्म उवाच:
ज्ञेय़ो न स नरेन्द्रस्थो दण्डप्रत्यय एव च ||
५० ख
भीष्म उवाच:
दण्डप्रत्ययदृष्टोऽपि व्यवहारात्मकः स्मृतः |
५१ क
भीष्म उवाच:
व्यवहारः स्मृतो यश्च स वेदविषय़ात्मकः ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
यश्च वेदप्रसूतात्मा स धर्मो गुणदर्शकः |
५२ क
भीष्म उवाच:
धर्मप्रत्यय उत्पन्नो यथाधर्मः कृतात्मभिः ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
व्यवहारः प्रजागोप्ता व्रह्मदिष्टो युधिष्ठिर |
५३ क
भीष्म उवाच:
त्रीन्धारय़ति लोकान्वै सत्यात्मा भूतिवर्धनः ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
यश्च दण्डः स दृष्टो नो व्यवहारः सनातनः |
५४ क
भीष्म उवाच:
व्यवहारश्च यो दृष्टः स धर्म इति नः श्रुतः |
५४ ख
भीष्म उवाच:
यश्च वेदः स वै धर्मो यश्च धर्मः स सत्पथः ||
५४ ग
भीष्म उवाच:
व्रह्मा प्रजापतिः पूर्वं वभूवाथ पितामहः |
५५ क
भीष्म उवाच:
लोकानां स हि सर्वेषां ससुरासुररक्षसाम् |
५५ ख
भीष्म उवाच:
समनुष्योरगवतां कर्ता चैव स भूतकृत् ||
५५ ग
भीष्म उवाच:
ततो नो व्यवहारोऽय़ं भर्तृप्रत्ययलक्षणः |
५६ क
भीष्म उवाच:
तस्मादिदमवोचाम व्यवहारनिदर्शनम् ||
५६ ख
भीष्म उवाच:
माता पिता च भ्राता च भार्या चाथ पुरोहितः |
५७ क
भीष्म उवाच:
नादण्ड्यो विद्यते राज्ञां यः स्वधर्मे न तिष्ठति ||
५७ ख